| श्रीहरिः ।।
संध्योपासनविधि, तर्पण बलिवैश्वदेवविधि
( मन्त्रानुवादसहित )
210.
॥ श्रीहरिः ॥
संध्योपासनविधि ओर
तर्पण एवं बलिवैश्वदेव-विधि|
( मन्त्रानुवादसहित )
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्व मम देवदेव॥
सम्पादक म० मर पं० विद्याधर शमां गौड, वेदाचार्य [8 1 पं० मदनमोहन शास्त्री ` =
¢ पाण्डेय पं० रामनारायणदत्त शास्त्री ॥
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[ 210 ]
॥ श्रीहरिः ॥
ब्राह्म मुहूर्त्मे जब चार घडी रात बाकी रहे, शयनसे उठकर भगवान्का स्मरण करे; फिर शौच-स्नानके अनन्तर शुद्ध वस्त्र धारण करके पवित्र तथा एकान्त-स्थानमे कुश अथवा कम्बल आदिके आसनपर पूर्व, ईशान अथवा उत्तर दिशाकी ओर मुँह करके वैठे। [ तीनों कालकी संध्याम उपर्युक्त दिशाओंकी ओर ही मुंह करके बैठना चाहिये, केवल सूर्यार््यदान, सूर्योपस्थान ओर गायत्रीजप सूर्याभिमुख होकर करना आवश्यक है ।] वाये हाथर्मे तीन कुश ओर दार्ये हाथमे दो कुर्शोकी बनी हुई पवित्री * ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ०'९ इस मन्त्रसे धारण करे । कुशके अभावमें सोने, चाँदी अथवा तौबेको अंगूठी पहनकर भी कार्य किया जा सकता है । ॐकार ओर व्याहतिर्यो सहित गायत्री-मन्त्रका उच्चारण करके शिखा बंध ले, यदि पहलेसे ही शिखा बंधी हो तो उसका स्पर्शमात्र कर ले। एक जोड़ा शुद्ध यज्ञोपवीत रं धारण किये रहना आवश्यक है । देहपर धौत वस्त्रके अतिरिक्त
९- ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः । तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम् ॥
२- यहां आवश्यक समञ्ञकर नूतन यज्ञोपवीत-धारणका समय तथा उसकी संक्षिप्त विधिका उल्लेख किया जाता है। अशौचके समाप्त होनेपर, मूत्र-पुरीषोत्सर्ग करते समय दाहिने कानके ऊपर जनेऊ रखनेमे भूल होनेपर या उसके गिरने अथवा टूट जानेपर नूतन यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये । इसके धारणकी संक्षिप्त विधि यह है--खानके अनन्तर आसनपर बैठकर आचमन करे, फिर यज्ञोपवीतको लेकर * आपो हि टा०' आदि मर्नत्रद्वारा जलसे उसका अभिषेक करे । तत्पश्चात् उसके नौ तन्तुओमिं क्रमशः ञछ्कार, अग्नि, सर्प, सोम, पितर, प्रजापति, वायु, यम ओर विश्वेदेवकी तथा तीन ग्रन्धिर्योमिं क्रमशः ब्रह्या, विष्णु ओर रुद्रकी भावना करके-
यज्ञोपवीतमिति परमेष्ठी ऋषिः क्िष्ट्छन्दः लिङ्गोक्ता देवता श्रौतस्मार्त- `
कर्मानुष्ठानाधिकारसिद्धये यज्ञोपवीतपरिधाने विनियोगः ।
[21011 ©
४: संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैश्वदेव-विधि
एक उत्तरीय वस्त्र (चादर या गमका आदि) डाले रहना चाहिये । उत्तरीय वस्त्रके अभावे एक ओर यज्ञोपवीत (कुल मिलाकर तीन यज्ञोपवीत) धारण किये रहे। फिर किसी पात्रे शुद्ध जल रखकर उसे बाय हाथमे उठा ते ओर दार्ये हाथके कुशसे अपने शरीरपर जल सचते हए निम्नांकित मन्र षदे- ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरत्पुण्डरीकाक्षं स॒ बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ “मनुष्य अपवित्र हो या पवित्र अथवा किसी भी दशा्मे स्थित हो, जो पुण्डरीकाक्ष. (कमलनयन) भगवान् विष्णुका स्मरण करता है, वह बाहर ओर. भीतर सन ओरसे शुद्ध हो जाता है।' फिर नीचे लिखे मन्त्रसे आसनपर जल चछिडककर दार्ये हाथसे उसका स्पर्श करे-
ॐ पृथि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥ “हे पृथ्वी देवि ! तुमने सम्पूर्ण लोर्कोको धारण कर रखा है ओर भगवान् विष्णुने तुम्हे धारण किया है । हे देवि ! तुम मुञ्चे धारण करो ओर
--यह विनियोग पदे ओर-
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥ यज्ञोपवीतमसि . यज्ञस्य त्वा . यज्ञोपवीतेनोपनद्यामि ।
| ‰& (पा० गृ० सूत्र २।२। १९)
--इस मन््रको पदकर एक जोडा यज्ञोपवीत पहने। फिर कमःसे-कम बीस बार
गायत्री-मन््रका जप करे। बलिवैश्वदेव करनेवालेको तीन यज्ञोपवीत धारण करके कम-
से-कम तीस बार गायत्रीका जप करना चाहिये । इसके बाद प्राचीन यज्चोपवीतको गलेसे
बाहर निकालकर "समुद्रं गच्छ स्वाहा'--इस मन्त्रको पढ़कर जलाशये फक दे । इस प्रकार यज्ञोपवीत धारण करनेके बाद ही संध्या आदि कर्म करनेका अधिकार होता है।
संध्योपासनविधि ५
मेरे आसनको पवित्र कर दो ।'
इसके बाद यथारुचि शास्त्रानुकूल भस्म, चन्दन * आदिका तिलक करे।
तत्पश्चात् “ॐ केशवाय नमः, * ॐ नारायणाय नमः", ` ॐ माधवाय नमः - इन तीनों मन्त्रोंको पकर प्रत्येकसे एक- एक बार [कुल तीन बार] पवित्र जलसे आचमन करे [आचमनके समय हाथ जानु्ओकि भीतर हो, पूर्व, ईशान या उत्तर दिशाकी ओर ही मुख हो। ब्राह्मण इतना जल पीये जो हदयतक पहुंच सके, क्षत्रिय इतना ही जल ग्रहण करे जो कण्ठतक पहुंच सके, वैश्य इतना जल ले जो तालुतक जा सके। उस समय ओट बहुत न खोले, अंगुलियों परस्पर सटी रहँ । अंगुष्ठ ओर कनिष्ठिका अलग रहँ । खडा न हो, हँसता न रहे + जलम फेन या बुलवबुले आदि न हो ] । ब्राह्यतीर्थसे तीन बार आचमन
* मृत्तिका चन्दनं चैव भस्म तोयं चतुर्थकम्। एभ्रद्रव्यर्यथाकालमूर्ध्वपुण्डुं भवेत् सदा॥ (आहिकप्रकाश) यहौँ ऊर्ध्वपुण्ड् शब्द तिलकके सभी प्रकार्योका उपलक्षक है। तात्पर्य यह कि तीर्थकी मिद्धी, चन्दन, भस्म अथवा जल-इन द्र्व्योसे समयानुसार सदा ऊर्ध्वपुण्ड, त्रिपुण्ड आदि किया जाता है। [ चन्दन देवताका प्रसाद ही धारण करे। केवल अपने लिये नहीं धिसना चाहिये ।] कुक लोग भस्म ओर चन्दने गायत्रीमनत्रका उपयोग करते है। सम्प्रदायनिष्ठ पुरु्षोको अपनी सम्प्रदाय-मर्यादाके अनुसार मन्त्रोका उपयोग करना चाहिये । सर्वसाधारण स्मार्त पुरु्षोके लिये भस्मधारणका मन्त्र यह लिखा जाता है- ` ॐ अग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्म व्योमेति भस्म सर्वश्ह वा इदः भस्म मन एतानि चक्षुश्षि' इस मन्त्रसे भस्मको अभिमन्त्रित करके त्र्यायुषं जमदग्नेः ' इस मन्त्रसे ललाटे, ' कश्यपस्य त्र्यायुषम्" इस मन्त्रसे गलेमे, "यदेवेषु त्रयायुषम्" इस मन्त्रसे दोनों भुजाओंकि मूलम ओर तन्नोऽस्तु त्र्यायुषम् इस मन्त्रसे हदये लगावे।
५
६ संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैशुवदेव-विधि
करनेके पश्चात् ' ॐ गोविन्दाय नमः' यह मन्त्र पटठकर हाथ धो ले। इसके बाद दो बार अगुटेके मूलसे ओठको पछि, फिर हाथ धो ले। अगृूठेका मूल ब्रह्मतीर्थं है। तत्पश्चात् भीगी हुई अंगुलियोँसे मुख आदिका स्पर्शं करे। मध्यमा-अनामिकास्ने मुख, तर्जनी-अंगुष्ठसे नासिका, मध्यमा- अगुष्ठसे नेत्र, अनामिका-अंगुष्ठसे कान, कनिष्ठिका-अंगुष्ठसे नाभि, दाहिने हाथसे हृदय, सब अंगुलि्योसे सिर, पाचों अंगुलिर्योसे दाहिनी बह
ओर बायीं बौँहका स्पर्शं करना चाहिये ।
तदनन्तर हाथर्मे जल लेकर निम्नांकित संकल्प पदठढकर वह जल भूमिपर गिरा दे-
हरिः ॐ तत्सदद्यैतस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धं श्रीश्चैतवाराह- कल्पे जम्बुद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तेकदेशान्तर्गते पुण्यक्षेत्रे कलियुगे कलिप्रथमचरणे अपुकसंवत्सरे ९ अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रोत्पननः अमुकशर्माऽहं २ ममोपात्तदुरितक्षयपूर्वकं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थ प्रातः [ मध्याह्न अथवा सायं 1-संध्योपासनं करिष्ये । इसके बाद निम्नांकिर्तश्विनियोग पठे-
ऋतं चेति त्रयचस्य माधुच्छन्दसोऽघमर्षण ऋषिरनुष्टुप् छन्दो भाववृत्तं दैवतमपामुपस्परशने विनियोगः ।
फिर नीचे लिखे मन्त्रको एक बार पदठकर एक ही बार आचमन करे-
ॐ ऋतद्छ सत्यञ्चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रातर्यजायत।
ततः समुद्रो अर्णवः। समुद्रादर्णवादधिसंवत्सरो अजायत।
१- ' अमुक" शब्दके स्थानम संवत्सर, मास आदिका नाम जोड़ लेना चाहिये।
२- ब्राह्मण अपने नामके अगे शर्मा, क्षत्रिय वर्मा ओौर वैश्य गुप्त शब्दका प्रयोग करे।
संध्योपासनविधि ७
अद्योरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी । सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्व- मकल्पयत्। दिवञ्च पृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्वः ॥ (ऋ्वेद १०।१९०।९)
[महाप्रलयके बाद इस महाकल्पके आरम्भे] सब ओरसे प्रकाशमान तपरूप परमात्मासे ऋत (सत्यसंकल्प) ओर सत्य (यथार्थं भाषण) -को उत्पत्ति हुई । उसी परमात्मासे रात्रि-दिन९ प्रकर हए तथा उसीसे जलमय समुद्रका आविर्भाव हुआ। जलमय समुद्रकी उत्पत्तिके पश्चात् दिनो ओर रात्रिर्योको धारण करनेवाला कालस्वरूप संवत्सर प्रकट हुआ जो कि पलक मारनेवाले जंगम प्राणियों ओर स्थावरोसे युक्त समस्त संसारको अपने अधीन रखनेवाला दहै। इसके बाद सबको धारण करनेवाले परमेश्चरने सूर्य, चन्द्रमा, दिव् (स्वर्गलोक), पृथिवी, अन्तरिक्ष तथा महर्लोक आदि लोर्कोकी भी पूर्वकल्पके अनुसार सृष्टि कौ।
तदनन्तर प्रणवपूर्वक गायत्री-मन्त्र पदकर रक्षाके लिये अपने चारो ओर जल छिड्के। फिर नीचे लिखे विनियोगको पदे -
अकारस्य ब्रह्मा ऋषिर्दैवी गायत्री छन्दः परमात्मा देवता सप्तव्याहतीनां प्रजापतिऋषि्गायत्रयुष्णिगनुष्टुल्बुहतीपङ्कि- तरिष्टुल्जगत्यश्छन्दांस्यग्निवायुसूर्यवबृहस्यतिवरुणेन्द्रविश्वेदेवा देवताः, ` तत्सवितुरिति विश्वामित्र २ ऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता, आपोज्योतिरिति शिरसः प्रजापति्ऋषिर्यजुश्छन्दो ब्रहाग्निवायुसूर्या देवताः प्राणायामे विनियोगः, | |
इसके पश्चात् ओंखिं बंद करके नीचे लिखे मन्त्रसे प्राणायाम करे । उसकी विधि इस प्रकार है-' पहले दाहिने हाथके अँगूठेसे नासिकाका
१- यहोँ रात्रि-दिन शब्दसे ब्रह्माकी रात्रि ओर दिन समने चाहिये । २- ' विश्वस्य जगतो मित्रं विश्वामित्रः प्रजापतिः।' इस वचनके अनुसार ` विश्वामित्र शब्दका अर्थ प्रजापति ब्रह्मा है।
८ संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैश्वदेव-विधि
दाया छिद्र बंद करके बार्ये छिद्रसे वायुको अंदर खीचे, साथ ही नाभिदेशं नीलकमलदलके समान श्यामवर्णं चतुर्भुज भगवान् विष्णुका ध्यान करते हए प्राणायाम-मन्त्रका तीन नार पाठ कर जाय। [यदि तीन बार मन्त्रपाठ ` नहो सके तो एक ही बार पाठ करे ओर अधिकके लिये अभ्यास बदावे।] इसे पूरक कहते है । पूरकके पश्चात् अनामिका ओर कनिष्ठिका अंगुलिर्योसे नासिकाके बार्ये छिद्रको भी बंद करके तबतक श्वासको रोके रहे, जबतक कि प्राणायाम-मन्त्रका तीन बार [या शक्तिके अनुसार एक बार] पाठ न हो जाय। इस समय हदयके बीच कमलके आसनपर विराजमान अरुण-गौर-मिश्रित वर्णवाले चतुर्मुख ब्रह्माजीका ध्यान करे । यह कुम्भक क्रिया है। इसके बाद अगूठा हटाकर नासिकाके दाहिने चखिद्रसे वायुको धीरि-र्धरि तबतक बाहर निकाले, जबतक प्राणायाम-मन्त्रका तीन [या एक] बार पाठ न हो जाय। इस समय शुद्धस्फटिकके समान श्वेतवर्णवाले त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरका ध्यान करे। यह रेचक- क्रिया है। यह सब मिलकर एक प्राणायाम कहलाता है । प्राणायामका मत्र यह है-
ॐ भुः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः उॐॐ सत्यम् ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रहम भूर्भुवः स्वरोम् ॥
| (तै० आ० प्र १० अ० २७) हम स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण विश्वको उत्पनन॒ करनेवाले उन निरतिशय प्रकाशमय परमेश्वरके भजनेयोग्य तेजका ध्यान करते है, जो कि हमारी बुद्धिर्योको सत्कर्मोकी ओर प्रेरित करते हँ ओर जो भूर्. भुवर्, स्वर्, महर्, जन, तप ओर सत्य नामवाले समस्त लोकमि व्याप्त रहँ तथा जो सच्विदानन्दस्वरूप जलरूपसे जगत्का पालन करनेवाले, अनन्त तेजके चाम, रसमय, अमृतमय ओर भूर्भुवःस्वःस्वरूप (त्रिभुवनात्मक) ब्रह्य है। फिर अगे लिखा विनियोग पटे-
संध्योपासनविधि ९
सूर्यश्च मेति नारायण ऋषिः प्रकृतिश्छन्दः सूर्यमन्युमन्युपतयो रात्रिश्च देवता अपामुपस्यरने विनियोगः ।
तत्पश्चात् निग्राङ्कति मन्रको पटकर एक बार आचमन करे- `
ॐ सूर्यश्च मा मन्युरुच मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्। यद्रात्र्या पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदवलुम्पतु। यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहं माममृतयोनौ सूर्यं ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा ॥ (तै० आ० प्र° १० अ० २५)
सूर्य, क्रोधके अभिमानी देवता ओर क्रोधके स्वामी-ये सभी क्रोधवश किये हुए पार्पोसे मेरी रक्षा करें [अर्थात् कृत पार्पोको नष्ट करके होनेवाले पार्पोसे बचार्वे ] । रातर्मे मने मन, वाणी, हाथ, पैर, उदर ओर शिश्न (उपस्थ) इन्द्रियसे जो पाप किये हो, उन सबको रात्रिकालाभिमानी देवता नष्ट करं। जो कुछ भी पापं मुञ्मे वर्तमान दहै, इसे ओर इसके कर्तृत्वका अभिमान रखनेवाले अपनेको मँ मोक्षके कारणभूत प्रकाशमय सूर्यरूप परमेश्वरम हवन करता हूं [ अर्थात् हवनके द्वारा अपने समस्त पाप ओर अहंकारको भस्म करता हु] । इसका भलीर्भाति हवन हो जाय।
उर्ण्युक्त आचमन-मन्त्र प्रातःकालकी संध्याका है। मध्याह्न ओर सायंकालके केवल आचमन-मन्त्र प्रातःकालसे भिन्न है।
मध्याहका विनियोग ओर मन्त्र इस प्रकार है-
आपः पुनन्त्विति नारायण ऋषिरनुष्टुप् छन्द आपः पृथिवी ब्रह्मणस्यतिर्ब्हमय च देवता अपामुपस्यर्शने विनियोगः ।
इस विनियोगको पदे। फिर नीचे लिखे मन्त्रको पदुकर एक लार आचमन करे-
ॐ आपः पुनन्तु पुथिवीं पृथिवी पूता पुनातु माम्। पुनन्तु ` ब्रह्मणस्यति््रहयापूता पुनातु माम्। यदुच्छ्छिमभोज्यं यद्वा द्श्चरितं मम। सर्व पुनन्तु मामापोऽसतां च प्रतिग्रहरस्वाहा ॥
(ते० आ० प्र° १० अ० २३)
१० संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैश्वदेव-विधि
जल पृथिवीको [प्रोक्षण आदिके द्वारा] पवित्र करे । पवित्र हुई पृथ्वी मुञ्धे पवित्र करे । वेर्दोकि पति परमात्मा मुञ्चे शुद्ध करे । मैने जो कभी किसी भी प्रकारका उच्छिष्ट या अभक्ष्य भक्षण किया हो अथवा इसके अतिरिक्त भी मेरे जो पाप ह, उन सबको दूर करके जल मुञ्ञे शुद्ध कर दे तथा नीच पुरूषोसे लिये हुए दानरूप दोषको भी दूर करके जल मुञ्चे पवित्र करे । पूर्वोक्त सभी दोर्षोका भलीभभांति हवन हो जाय।
सायंकालके आचमनका विनियोग ओर मन्त्र इस प्रकार है-
अग्निषटच मेति नारायण ऋषिः प्रकृतिश्छन्दोऽग्निमन्युमन्यु-
पतयोऽहश्च देवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः । इस. विनियोगको पदे। फिर नीचे लिखे मन्त्रको पदकर एक बार आचमन करे-
ॐ अग्निश्च मा मन्युशुच मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्। यदह्ना पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना अहस्तदवलुम्पतु। यत्किञ् दुरितं मयि इदमहं माममृतयोनौ सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा ॥ (तै० आ० प्र° १० अ० रे)
; "अग्नि, क्रोधके अभिमानी देवता ओर क्रोधके स्वामी-ये सभी क्रोधवशं किये हुए पार्पोसे मेरी रक्षा करे [ अर्थात् कृत पार्पोको नष्ट करके होनेवाले पार्पोसे बचाव ] । मैने दिनम मन, वाणी, हाथ, पैर, उदर ओर शिश्न (उपस्थ) इन्द्ियसे जो पाप किये हो, उन सबको दिनके अभिमानी देवता नष्ट कररे। जो कुछ भी पाप मुम वर्तमान दहे, इसे तथा इसके कर्तृत्वका अभिमान रखनेवाले अपनेको मँ मोक्षके कारणभूत सत्यस्वरूप प्रकाशमय परमेश्वरम हवन करता हू [ अर्थात् हवनके द्वारा अपने सारे पाप ओर अहंकारको भस्म करता हूं ]। इसका भलीभँति हवन हो जाय।
फिर निम्नांकित विनियोगको पदे- आपो हि ष्ठेति त्रयुचस्य सिन्धुद्रीप ऋषिर्गायत्री छन्द आपो देवता मार्जने विनियोगः। `
संध्योपासनविधि १९
इसके पश्चात् निम्नांकित तीन ऋचाओंके नौ चरणर्मेसे सात चरणोँको पटते हुए सिरपर जल सींचे, आठर्वेसे पृथ्वीपर जल डाले ओर फिर नवे चरणको पटठकर सिरपर ही जल सींचे। यह मार्जन तीन कुशो अथवा तीन अंगुलिर्योसे करना चाहिये। मार्जन-मनत्र ये है ॐ आपो हि ठा मयोभुवः । ॐ ता न ऊजं दधातन । ॐ महे रणाय चक्षसे। ॐ यो वः शिवतमो रसः। ॐ तस्य भाजयतेह नः। ॐ उशतीरिव मातरः। ॐ तस्मा अरं गमाम वः। ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ । ॐ आपो जनयथा च नः। (यजु ११। ५०-५२) हे जल ! तुम निश्चय ही कल्याणकारी हो, अतः [अनादि रसकि द्वारा] बर्लको वृद्धिके लिये तथा अत्यन्त रमणीय परमात्मदर्शनके लिये तुम हमारा पालन करो । जिस प्रकार पुत्रोंकी तुष्टि चाहनेवाली मातां उन्हँ अपने स्त्नोका दुग्ध पान कराती है, उसी प्रकार तुम्हारा जो परम कल्याणमय रस हे, उसके भागी हरमे बनाओ। हे जल ! जगत्के जीवनाधारभूत्त जिस रसके एक अंशसे तुम समस्त विश्वको तृप्तं करते हो, उस रसकी पूर्णताको हम प्राप्त हों [ अर्थात् उस रससे हम पूर्णतया तृप्ति लाभ करे ।] । हे जल! तुम हममे उस रस्के भोक्ता बनाओ [अर्थात् उसे भोगनेकी क्षमता दो] । तदनन्तर नीचे लिखे विनियोगको पदे- | द्रुपदादिवेत्यश्चिसरस्वतीन्द्रा ऋषयोऽनुष्टुप् छन्द आपो देवताः शिरस्मेके विनियोगः। फिर वार्य हाथमे जल लेकर उसे दाहिने हाथसे ठक ले ओर नीचे लिखे मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उसे सिरपर चिड्क ले- ॐ द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव । पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः। (यजु २०। २०) जैसे पादुकासे अलग होता हुआ मनुष्य पादुकाके मलादि दोर्षोसे मुक्त
१२. संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैशुवदेव-विधि
हो जाता है, जिस प्रकार पसीनेसे भीगा हआ पुरुष स्नान करनेके पश्चात् मैलसे रहित होता है तथा जैसे पवित्रक आदिसे घी शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार जल मुञ्चे पार्पोसे शुद्ध करे [अर्थात् मुञ्चे सर्वथा निष्पाप कर दे] |
पुनः निम्नांकित विनियोग-वाक्यको पदे-
ऋतञ्चेति त्रयुचस्य ्राधुच्छन्दसोऽघमर्षण ऋषिरनष्टुप् छन्दो भाववृत्त दैवतमघमर्षणे विनियोगः।
फिर दाहिने हाथमे जल लेकर नासिकामें लगावे ओर [ यदि सम्भव हो तो श्वास रोककर] नीचे लिखे मन्त्रको तीन बार या एक बार पटृते हए मन~=ही-मनं यह भावना करे कि यह जल नासिकाके बार्ये छिद्रसे भीतर घुसकर अन्तःकरणके पापको दार्ये छिद्रसे निकाल रहा है, फिर उस जलकी ओर दृष्टि न डालकर अपनी बायीं ओर फक दे [अथवा वामभागर्मे शिलाको भावना करके उसपर उस पापको पटककर नष्ट कर देनेकी भावना करे] ।
अघमर्षण-मन्त्र इस प्रकार है- |
ॐ ऋतञ्च सत्यञ्चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत । ततः समूद्रो अर्णवः। समुद्रादर्णंवादधिसंवत्सरो अजायत। अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी । सूर्याचन्त्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। दिवञ्च पृथिवीञ्चान्तरिश्षमथो स्वः ॥*
. (ऋण्वेद १०।१९०।१) इसके पश्चात् नीचे लिखे विनियोग-वाक्यका पाठ करे- अन्तश्चरसीति तिरश्चीन ऋषिरनुष्टुप् छन्द आपो देवता
अपामुपस्परशने विनियोगः। फिर आगे लिखा मन्त्र पटकर एक बार आचमन करे- * इस मन््रका अर्थं इसी पुस्तकके पुष ७ पर दिया जा चुका है।
संध्योपासनविधि ९३
ॐ अन्तश्चरसि भूतेषु गहायां विश्वतोमुखः । त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृत्॥ (कात्यायनपरिशिष्टसूत्र)
"हे जलरूप परमात्मन् ! तुम॒ समस्त प्राणिर्योके भीतर उनको हदयरूप गुहाम विचरते हो, तुम्हारा सब ओर मुख है; तुम्हीं यज्ञ हो, तुम्हीं वषट्कार (इन्द्रादिका भाग हविष्य) हो ओर तुम्हीं जल, प्रकाश, रस एवं अमृत हो।!
तदनन्तर नीचे लिखे विनियोग-वाक्यका पाठमात्र करे-
उश्कारस्य ब्रह्मा ऋषि्दैवी गायत्री छन्दः परमात्मा देवता, तिसुणां महाव्याहतीनां प्रजापतित्ऋषिर्गायत्रयुष्णिगनुष्टुभ- श्छन्दांस्यग्निवायुसूर्या देवताः, तत्सवितुरिति विश्वामित्र ऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता सूर्या्ध्यदाने विनियोगः ।
फिर सूर्यके सामने एक चरणकी एडी (पिछला भाग) उटठाये हुए अथवा एक पैरसे खड़ा होकर या एक पैरके आधे भागसे खडा हो ॐकार ओर व्याहतियों सहित गायत्री-मन्त्रको तीन बार पढ़कर पुष्प मिले हुए जलसे सूर्यको तीन बार अर्ध्यं दे । प्रातः ओर मध्याहका अर्घ्य जलम देना चाहिये । यदि जल न हो तो स्थलको भलीभाति जलसे धोकर उसीपर अर्घ्यका जल गिरावे; परन्तु सायंकालका अर्घ्य कदापि जलम न दे। खड़ा होकर अर्घ्य ` देनेका नियम केवल प्रातः ओर मध्याहकी संध्यामें है; सायंकालमे तो बैठकर भूमिपर ही अर््य-जल गिराना चाहिये । मध्याहकी संध्याम एक ही बार अर्ध्य देना चाहिये ओर प्रातः एवं सायं-संध्यामें तीन-तीन बार । सूर्यार्घ्यं देनेका मन्त्र [ अर्थात् प्रणव-व्याहतिसहित गायत्री-मन्त्र] इस प्रकार है-- `
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरिण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोद्यात्।* | (यजु० ३६। २)
इस मन्त्रको पद्कर ' ब्रह्मस्वरूपिणे सूर्यनारायणाय इदमर्घ्यं दत्तं
* गायत्री -मन्त्रका अर्थं इसी पुस्तकके पृष्ट १८ पर देखिये।
१४ संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैश्वदेव-विधि
न मम' एेसा कहकर प्रातःकाल९ अर्घ्य समर्पण करे । तदनन्तर नीचे लिखे विनियोग~वाक्यको पदे- उद्रयमिति प्रस्कण्व ऋषिरनुष्टुष्छन्दः सूर्यो देवता, उदु त्यमिति प्रस्कण्व ऋषिर्निचुदगायत्री छन्दः सूर्यो देवता, चित्रमिति कुत्साद्धिरस ऋषिस्त्रिष्टुष्छन्दः सूर्यो देवता, तच्चक्षुरिति दध्यङ्द्गथर्वण ऋषिरेकाधिका ब्राही व्रिष्टप्छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः । तदनन्तर प्रातःकाल खडा होकर ओर सायंकाल बैठे हुए ही अञ्जलि बोधकर तथा मध्याहकालरमे खडा हो दोनो भुजां ऊपर उठाकर [यदि सम्भव हो तो] सूर्यकी ओर देखते हुए “उद्वयम्० * इत्यादि चार मर्न्त्रोको पटकर उन्द प्रणाम करे। फिर अपने स्थानपर ही सूर्यदेवकी एक लार प्रदक्षिणा करते हए उन्हें नमस्कार करके बैठ जाय [ मध्याहकालमें गायत्री-मन्त्र, विभ्राद्-अनुवाक, पुरुषसूक्त, शिवसंकल्प ओर मण्डलब्राह्यणका भी यथासम्भव पाठ करना चाहिये २ ।] ॐ उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम्। देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम् ॥ (यजु ° २०। २९) हम अन्धकारसे ऊपर उठकर उत्तम स्वर्गलोकको तथा देवता्ओमिं अत्यन्त उत्कृष्ट सूर्यदेवको भलीभोति देखते हए उस सर्वोत्तम ज्योतिर्मय परमात्माको प्राप्त हो । ॐ उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय सूर्यम्॥ (यजु० ७। ४१) उत्पन हए समस्त प्राणिर्योके ज्ञाता उन सूर्यदेवको छन्दोमय अश्व सम्पूर्णं जगत्को उनका दर्शन कराने [या दृष्ट प्रदान करने ]-के लिये १- मध्याहकालमें "ब्रह्यस्वरूपिणे के स्थानपर ' विष्णुस्वरूपिणे' ओर सायंकालमे ˆरुद्रस्वरूपिणे" एेसा परिवर्तन कर लेना चाहिये ।
२- गयत्र्या च यथाशक्तिविभ्राडित्यनुवाकपुरुषसृक्तशिवसंकल्पमण्डल- बराह्यणैरित्युपस्थाय प्रदक्षिणीकृत्य नमस्कृत्योपविशेत्। (का० सू° क० २)
संध्योपासनविधि १५
ऊपर-ही-ऊपर शीघ्रगतिसे लिये जा रहे हैँ । ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः । आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षस्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥ (यजु ७।४२ ) जो तेजोमयी किरर्णोके पुञ्ज है, मित्र, वरुण तथा अग्नि आदि देवताओं एवं समस्त विश्वके नेत्र हँ ओर स्थावर तथा जंगम-सबके अन्तर्यामी आत्मा है, वे भगवान् सूर्य आकाश, पृथ्वी ओर अन्तरिक्षलोकको अपने प्रकाशसे पूर्णं करते हुए आश्चर्यरूपसे उदित हुए है । ॐ तच्चक्षर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतः श्णुयाम शरदः शतं प्र ब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥ *
(यजु० ३६। २४) देवता आदि सम्पूर्णं जगत्का हित करनेवाले ओर सबके नेत्रूप वे
* इसके बाद कुछ प्रतिर्योमिं अंगन्यासका उल्लेख मिलता है, किंतु धर्माव्धिसार आदि ग्रन्थोरमे न्यास आदि कर्मको अविवक्षित बताया है, अतः उसका करना न करना अपनी इच्छापर निर्भर है। जो लोग अंगन्यास करनेकी इच्छा रखते हो, उनकी सुविधाके लिये यहो अंगन्यास-विधि दी जाती है-
हदयाय नमः॥ १॥ ॐ भूः शिरसे स्वाहा ॥ २॥ ॐ भुवः शिखायै वषट्॥ ३॥ ॐ स्वः कवचाय हुम्॥ ४॥ ॐ भूर्भुवः नेत्राभ्यां वौषट्॥५॥ ॐ भूर्भुव स्वः अस्त्राय फट्॥ ६॥
उपर्युक्त छः मन्त्रवाक्य अंगन्यासके है । इनर्मेसे पहले वाक्यका उच्चारण कर दाहिने हाथकी रपो्चों अंगुलिर्योसे हदयका स्पर्श करे । दूसरे वाक्यसे मस्तकका ओर तीसरेसे शिखाका स्पर्शं करे । चतुर्थ वाक्य पटठकर दाहिने हाथकी अंगुलिर्योसे बाय कंधेका ओर बाय हाथकी अंगुलियोँसे दार्ये कंधेका स्पर्श करे । पञ्चम वाक्यसे दोर्ना नेका स्पर्शं करना चाहिये। छटा वाक्य पदृकर दाहिने हाथको बायीं ओरसे पीडेकी ओर ले जाकर दाहिनी ओरसे आगेकी ओर ले आवे ओर तर्जनी तथा मध्यमा अगुलिर्योसे बाय हाथकी हथेलीपर ताली बजावे।
१६ संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैश्वदेव-विधि
तेजोमय भगवान् सूर्य पूर्व दिशासे उदित हो रहे है । [ उनके प्रसादसे] हम सौ वर्षोतक देखते रर्ह, सौ वर्षोतक जीते ररह, सौ वर्षोतक सुनते रहै, सौ वर्षोतक हममे बोलनेकी शक्ति रहे तथा सौ वर्षोतक हम कभी दीन- दशाको न प्राप्त हों । इतना ही नहीं, सौ वर्षसि अधिक कालतक भी हम देखें, जीवे, सुरने, बोले एवं कभी दीन न हो ।
इसके बाद--
तेजोऽसीति धाम नामासीत्यस्य च परमेष्ठी प्रजापतिनऋषिर्यजु- च्रष्टुवृगुष्णिहौ छन्दसी सविता देवता गायत्र्यावाहने विनियोगः।
इस विनियोगको पटुकर निम्नांकित मन्त्रसे विनयपूर्वक गायत्रीदेवीका आवाहन करे-
ॐ तेजोऽसि शक्रमस्यमृतमसि। धाम नामासि प्रियं देवानामनाधष्टं देवयजनमसि । (यजु० १।३१)
हे सूर्यस्वरूपा गायत्री देवि ! तुम देदीप्यमान तेजोमयी हो, शुद्ध हो ओर अमृत (नित्य ब्रह्मरूपा) हो । तुम्हीं परम धाम ओर नामरूपा हो। तुम्हारा किसीसे भी पराभव नहीं होता। तुम देवतार्ओंकी प्रिय ओर उनके यजनकी साधनभूता हो [ भँ तुम्हारा आवाहन करता हूं ]।
फिर नीचे लिखे विनियोग-वाक्यको पदे गायत्र्यसीति विवस्वान् ऋषिः स्वराण्महापङ्धिश्छन्दः परमात्मा
देवता गायत्युपस्थाने विनियोगः ।
तत्पश्चात् नीचे लिखे मन्त्रसे गायत्रीको प्रणाम करे- ॐ गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्यद्यपदसि न हि पद्यसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदो मा प्रापत् ॥ (बृहदारण्यक-उप० ५। १४। ७) हे गायत्रि ! तुम त्रिभुवनरूप प्रथम चरणसे एकपदी हो, ऋक्, यजु
। एवं सामरूप द्वितीय चरणसे द्विपदी हो । प्राण, अपान तथा व्यानरूप तृतीय
चरणसे त्रिपदी हो ओर तुरीय ब्रह्मरूप चतुर्थं चरणसे चतुष्पदी हो । निर्गुण
संध्योपासनविधि ९७
स्वरूपसे अचिन्त्य होनेके कारण तुम ' अपद् ' हो [ इसीलिये वेद ' नेति- नेति" कहकर तुम्हारे स्वरूपका वर्णन करते है ]। अतएव मन-बुद्धिके अगोचर होनेसे तुम सबके लिये प्राप्य नहीं हो । तुम्हारे दर्शनीय (अनुभव करनेयोग्य) चतुर्थं पदको, जो प्रपञ्चसे परे वर्तमान शुद्ध परब्रह्यरूप है, नमस्कार है। तुम्हारी प्राप्प्मे विघ्न डालनेवाले वे राग-देष, काम-क्रोध आदिरूप पाप मेरे पास न पहुंच सर्के [अर्थात् परब्रह्यस्वरूपिणी तुम्हें निर्विघ्न प्राप्त करू] ।*
इसके अनन्तर नीचे लिखे विनियोग-वाक्यको पदे--.
उकारस्य ब्रह्मा ऋषिदैवी गायत्री छन्दः परमात्पा देवता, तिसृणां महाव्याहतीना प्रजापतितऋषिर्गायत्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांस्यग्नि- वायुसूर्या देवताः तत्सवितुरिति विश्वामित्र ऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता जपे विनियोगः।
फिर नीचे लिखे अनुसार गायत्री-मन्त्रका कम-से-कम १०८ बार माला आदिसे गिनते हए जप करे। अधिक जहँतक हो अच्छा है! जपके समय गायत्रीके तेजोमय स्वरूपका ध्यान ओर मन्त्रके अर्थका अनुसंधान होता रहे तो बहुत ही उत्तम है। गायत्री-मन्त्र इस प्रकार है--
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितु्वरिण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ॐ। (यजु ° २६।२)
* इस मन्त्रका दूसरा अर्थं इस प्रकार भी हो सकता है-
हे गायत्री देवि ! तुम समग्र ब्रह्मरूपा होनेके कारण एक पदवाली हो [अर्थात् जो कुछ है, वह ब्रह्मस्वरूप ही है, इस न्यायसे तुम एक पदवाली हो] । सगुण- निर्गुणरूपा होनेसे तुम दो पर्दोवाली हो । ब्रह्मा, विष्णु ओर शिवरूपसे तीन पर्दोवाली हो। विराट्, हिरण्यगर्भ, ईश्वर ओर परब्रह्यरूपा होनेके कारण तुम चार पर्दोवाली हो। अचिन्त्य होनेसे तुम * अपद्" हो, अतएव सबके लिये तुम प्राप्त नहीं हो। तुम्हारे दर्शनीय (अनुभव करनेयोग्य) चतुर्थं पदको, जो प्रपञ्चसे परे वर्तमान शुद्ध
परब्रह्मस्वरूप है, नमस्कार है। तुम्हारी प्राप्ते विघ्न डालनेवाले वे राग-देष, काम-
क्रोध आदिरूप पाप मेरे पास न पंच सके [अर्थात् परत्रह्स्वरूपिणी । तुम्हे मै निर्विघ्न प्राप्त कर] ।
[21012 ^
१८ संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं खलिवैश्वदेव-विधि
हम स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्णं विश्वको उत्पन्न करनेवाले उन निरतिशय प्रकाशमय परमेश्वरके भजनेयोग्य तेजका ध्यान करते है जो हमारी बुद्धियोको सत्कर्मोकी ओर प्रेरित करते हैँ तथा जो भूर्लोक, भुवर्लोक ओर स्वर्लोकरूप सच््विदानन्दमय परब्रह्य हैँ ।९
तदनन्तर नीचे लिखे विनियोग-वाक्यका पाठ करे-
विश्वतश्चक्षुरिति भौवन ऋषिस्त्ष्टुप्छन्दो विश्वकर्मा देवता
सूर्यप्रदक्षिणायां विनियोगः । फिर नीचे लिखे मन्त्रसे अपने स्थानपर खडे होकर सूर्यदेवकी एक बार प्रदक्षिणा करे-
ॐ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्यात्।
सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रर्दयावाभूमी जनयन् देव एकः ॥२ (यजु० १७। १९)
वे एकमात्र परमात्मा पृथ्वी ओर आकाशकी रचना करते समय धर्माधर्मरूप भुजाओं ओर पतनशील पञ्चमहाभूतोंसे संगत होते अर्थात् काम लेते ्है। तात्पर्य यह कि धर्माधर्मरूप निमित्त ओर पञ्चभूतरूप उपादान
` कारर्णोसे अन्य साधनकी सहायता लिये बिना ही सबको सृष्टि करते हेँ। उनके सब ओर नेत्र है, सब ओर मुख ह, सब ओर भुजां हँ ओर सब ओर चरण ह [अर्थात् सर्वत्र उनकी सभी इन्द्र्यो है, अथवा सब प्राणी परमेश्वरके स्वरूप है; अतः उनके जो नेत्र आदि है, वे उनमें व्याप्त
१- इस मन्त्रका अर्थं एेसा भी है- सच्चिदानन्द, विरार्स्वरूप, ` सब संसारको उत्पन्न करनेवाले परमेश्वरके उस भजनेयोग्य तेजका हमलोग ध्यान करते है, जो हमलोर्गोकी बुद्धिर्योको अपने स्वरूपम लगे । | . २- प्रदक्षिणाका पौराणिक श्लोक इस प्रकार है- यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च। तानि तानि प्रणश्यन्ति प्रदक्षिणपदे पदे॥
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संध्योपासनविधि १९९
परमात्माके ही नेत्र आदि है ]। इसके पश्चात् बैठकर निम्नांकित विनियोगका पाठ करे- ॐ देवा गातुविद इति मनसस्पतिकऋषिर्विराडनुष्टुष्छन्दो वातो
देवता जपनिवेदने विनियोगः।
फिर--
ॐ देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित। मनसस्पत इमं देव यजः स्वाहा वाते धाः॥ (यजु० २।२१)
^ हे यज्ञवेत्ता देवताओं ! आपलोग हमारे इस जपरूपी यज्ञको पूर्ण हुआ जानकर अपने गन्तव्य मार्गको पधार । हे चित्तके प्रवर्तक परमेश्वर । मै इस जप-यज्ञको आपके हाथमे अर्पण करता हं। आप इसे वायुदेवतामे स्थापित करे *।' इस मन्त्रको पढ़कर नमस्कार क्ररनेके अनन्तर- अनेन यथाशक्तिकृतेन गायत्रीजपाख्येन कर्मणा भगवान् सूर्यनारायणः प्रीयतां न मम। यह वाक्य पटे। इसके बाद- उत्तमे शिखरे इति वामदेव ऋषिरनुष्टुष्छन्दो गायत्री देवता गायत्रीविसर्जने विनियोगः। इस विनियोगको पढठकर- ॐ उत्तमे शिखरे देवी भूम्यां पर्वतमूर्धनि। ब्राहयणेभ्योऽभ्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम् ॥ (तै० आ० प्र १० अ० ३०) "हे गायत्री देवि ! अब तुम अपने उपासक ब्राह्य्णोके पाससे उनको अनुमति लेकर भूमिपर स्थित जो मेरुनामक पर्वत है, उसकी चोरीपर
* वाते हि यज्ञोऽवतिष्ठते। तथा च श्रुतिः - वायुरेवाग्निस्तस्माद् यदैवाध्वर्युरु्तमं कर्म करोत्यथेनमेवाप्येति।
२० संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैश्वदेव-विधि
विद्यमान जो सुरम्य शिखर है, वही तुम्हारा वासस्थान है; उसर्मे निवास करनेके लिये सुखपूर्वक जाओ ।' इस मन्त्रको पदढकर गायत्री देवीका विसर्जन करे, फिर निम्नांकित वाक्य पटठकर यह संध्योपासनकर्म परमेश्वरको समर्पित करे- अनेन संध्योपासनाख्येन कर्मणा श्रीपरमेश्वरः प्रीयतां न मम। ॐ तत्सदूब्रहयार्पणमस्तु। फिर भगवान्का स्मरण करे- यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु। न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥ ॐ विष्णवे नमः ॥ ॐ विष्णवे नमः ॥ ॐ विष्णवे नमः ॥ ॥ श्रीविष्णुस्मरणात्परिपूर्णतास्तु ॥ ॥ इति ॥
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| माहात्प्यसहित संध्याकालनिर्णय |
उत्तमा तारकोपेता मध्यमा लुप्ततारका। कनिष्ठा सूर्यसहिता प्रातःसंध्या त्रिधा स्पृता॥९॥ मध्या मध्याहे॥ २॥ उत्तमा सूर्यसहिता मध्यमा लुप्तभास्करा। कनिष्ठा तारकोपेता सायंसंध्या त्रिधा स्मृता॥२३॥ सन्ध्या येन॒ न विज्ञाताः सन्ध्या येनानुपासिता। जीवन्नेव भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजायते॥ (देवीभागवत ११। ९६। ६) “जो द्विज संध्या नहीं जानता ओर संध्योपासन नहीं करता वह जीता हुआ दही शूद्र हो जाता है ओर मरनेपर कुत्तेको योनिको प्राप्त होता हेै।'
सन्ध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु। यदन्यत् कुरुते कर्मन तस्य फलभाग्भवेत्॥ (दक्षस्मृति २। २०)
* संध्याहीन द्विज नित्य ही अपवित्र है ओर सम्पूर्णं धर्मकार्यं करने्मे अयोग्य है। वह जो कुछ अन्य कर्म करता है उसका फल उसे नहीं मिलता ।'
न तिष्ठति तु यः पूर्वा नोपास्ते यश्च पश्चिमाम्। स॒ शृद्रवद्रहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः॥ (मनु° २। १०३) “जो द्विज प्रातःकाल ओर सायंकालकी संध्या नहीं करता, उसे शुद्रकी भोति द्विजातिर्योकि करनेयोग्य सभी कर्मोसि अलग कर देना चाहिये ।' सन्ध्यामुपासते ये तु सततं शंसितव्रताः। विधूतपापास्ते यान्ति ब्रह्मलोकं सनातनम्॥ ॐ (अत्रि)
२२ संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैश्वदेव-विधि
"जो प्रशंसितत्रती सदा संध्योपासन करते है, उनके पाप नष्ट हो जाते है ओर वे सनातन ब्रह्मलोकको प्राप्त करते है।' यावन्तोऽस्यां पृथिव्यां हि विकर्मस्थास्तु वै द्विजाः। तेषां . वै पावनार्थाय सन्ध्या सृष्टा स्वयम्भुवा ॥ | ( याज्ञवल्क्य) "इस पृथ्वीपर निषिद्ध कर्म करनेवाले जितने भी द्विज रहै, उन सबको पवित्र करनेके लिये स्वयं ब्रह्माजीने संध्याका निर्माण किया।' निशायां वा दिवा वापि यदज्ञानकृतं भवेत्। त्रिकालसन्ध्याकरणात् तत्सर्व हि प्रणश्यति॥ | ( याज्ञवल्क्य) “राते या दिनर्मे जिस किसी समय अज्ञानके कारण जो भी अनुचित कर्म घरित हो जाते है, वे सब त्रिकाल-संध्या करनेसे नष्ट हो जाते हैँ ।' सन्ध्यालोपस्य चाकर्ता स्नानशीलश्च यः सदा। तं दोषा नोपसर्पन्ति गरुत्मन्तमिवोरगाः॥ ( कात्यायन) “जो कभी संध्याका लोप नहीं करता अर्थात् नित्य संध्या करता है ओर जो सदा स्नानशील है, उसके पास दोष उसी तरह नहीं रहते जैसे गरुडके सांनिध्ये सोप ।'
1, १7, 7
॥ श्रीहरिः ॥
[ देवर्भिमनुष्यपितुतर्पण-विधथि ]
प्रातःकाल ब्राह्यीवेलाके पूर्वं शयनसे उठकर शोचादिसे निवृत्त हो किसी नदी, सरोवर या कुरेपर ही अपनी सुविधाके अनुसार स्नान करके शुद्ध उज्ज्वल वस्त्र पहनकर पूर्वाभिमुख हो कुशासनपर बेठे। फिर तीन बार आचमन ९ करके संध्योपासना एवं नित्यहोम करनेके पश्चात् बार्ये ओर दाये हाथकी अनामिका अंगुलिमें * पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ०२'- इस मन्त्रको सम्पूर्णरूपसे पदृते हुए पवित्री (पती) धारण करे। फिर हाथमे त्रिकुश, यव, अक्षत ओर जल लेकर निमप्राङ्ितरूपसे संकल्प पदे
ॐ विष्णवे नमः ३। हरिः ॐ तत्सदद्यतस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपराधं श्रीश्चैतवाराहकल्ये जम्बुद्वीपे भरतखण्डे आर्यावतैकदेशे कलियुगे कलिप्रथमचरणे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रोत्पनुः अमुकश्मां ( वर्मा गुप्तः ) अहं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थ देवर्षिमनुष्यपितुतर्पणं करिष्ये ।
१- यहां आचमनका प्रकार बतलाया जाता है--' ॐ केशवाय नमः स्वाहा, ॐ नारायणाय नमः स्वाहा, ॐ माधवाय नमः स्वाहा"-इनं तीन मन्त्रोको पदकर प्रत्येकसे एक-एक बार (कुल तीन बार) एक-एक माशा जल पीना चाहिये; फिर "ॐ गोविन्दाय नमः'--इस मन्त्रसे दायो हाथ धोकर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" इस मन्त्रसे अपने ऊपर प्रदक्षिणक्रमसे जल सीचे।
पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः । तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्॥
“हे पवित्र करनेवाले युगल कुशमय पवित्रको . ! तुम दोनों यज्ञसे सम्बन्ध रखनेवाले हो।
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२४ संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैश्वदेव-विधि
तदनन्तर एक तने अथवा चोदीके पात्रमे ९ शेत चन्दन, चावल, सुगन्धित पुष्प ओर तुलसीदल रखे, फिर उस पात्रके ऊपर एक हाथ या प्रादेशमात्र लम्बे तीन कुश रखे, जिनका अग्रभाग पूर्वक ओर रहे। इसके बाद उस पात्रर्मे तर्पणके लिये जल भर दे; फिर उसर्मे रखे हए तीनों कुर्शोको तुलसीसहित सम्पुटाकार दार्ये हाथमे लेकर वार्य हाथसे उसे ढंक ले ओर निग्रह्भिति मन्त्र पदते हुए देवतार्ओका आवाहन करे । ॐ विश्वेदेवास आगत श्ुणुता म॒ इम £ हवम्। एदं बर्हिर्निषीदत ॥ (यजु° ७। ३४) हे विश्वेदेवगण ! आपलोग यँ पदार्पण करे, हमारे प्रेमपूर्वक किये हुए इस आवाहनको सुने ओर इस कुशके आसनपर विराजमान हो । विश्वेदेवाः श्ुणुतेम : हवं मे ये अन्तरिश्रे य उप दविष्ठ । ये अग्रिजिहया उत वा यजत्रा आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वम्॥ (यजु ३३। ५३) हे विश्वेदेवगण । आपलोगेमिंसे जो अन्तरिक्षे हो, जो द्युलोक (स्वर्ग) - के समीप हो तथा अग्निके समान जिह्वावाले एवं यजन करने योग्य हो, वे सब हमारे इस आवाहनको सुने ओर इस कुशासनपर बैठकर तृप्त हो । आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेवा महाबलाः । ये तर्पणेऽत्र विहिताः सावधाना भवन्तु ते॥ जिनका इस तर्पण्मे वेदविहित अधिकार है, वे महान् बलवाल महाभाग विश्वेदेवगण यहां आवें ओर सावधान हो जायं । इस प्रकार आवाहनकर कुशका आसन दे ओर उन पूर्वाग्र कुर्शोद्वारार १- तर्पणे सोना, चाँदी, ताबा अथवा कसका पात्र होना चाहिये, मिट्रीका नहीं, जैसा कि पितामहका वचन है- हैमं रौप्यमयं पात्रं तामप्रकास्यसमुद्धवम्। पितृणां तर्पणे पात्रं मृण्मयं तु परित्यजेत् ॥ २- देवतार्ओंका तर्पण कुशके अग्रभागसे, मनुर््योका मध्यभागसे ओर पितर्योका मूलाग्र एवं दक्षिणाग्रभागसे होना चाहिये । इसी प्रकार देवतर्पणमें पूर्वाभिमुख, मनुष्यतर्पणमे उत्तराभिमुख ,ओर पितृतर्पणमें दक्षिणाभिमुख रहना चाहिये। दक्षस्मृतिमे लिखा है-
तर्पण-विधि २५
दाय हाथकी समस्त अंगुलियोके अग्रभाग अर्थात् देवतीर्थसे ब्रह्मादि देवताओंके लिये पूर्वोक्त पात्र्मेसे एक-एक * अञ्जलि चावलमिश्रित जल लेकर दूसरे पात्रमे गिरावे ओर निम्नांकितरूपसे उन-उन देवता्ओंके नाममन्त्र पदता रहे-
देवतर्पण
ॐ ब्रह्मा तृप्यताम्। ॐ विष्णुस्तुप्यताम्। ॐ रुद्रस्तुष्यताम्। ॐ प्रजापतिस्तृप्यताम्। ॐ देवास्तुप्यन्ताम्। ॐ छन्दांसि तृष्यन्ताम्। ॐ वेदास्तुष्यन्ताम्। ॐ ऋषयस्तुप्यन्ताम्। ॐ पुराणाचार्या- स्तुप्यन्ताम्। ॐ गन्धर्वास्तुप्यन्ताम्। ॐ इतराचार्यास्तष्यन्ताम्। ॐ संवत्सरः सावयवस्तृष्यताम्। ॐ देव्यस्तष्यन्ताम्। ॐ अप्सरसस्तुष्यन्ताम्। ॐ देवानुगास्तुष्यन्ताम्। ॐ नागास्तष्यन्ताम्। ॐ सागरास्तुष्यन्ताम्। ॐ पर्व॑तास्तुप्यन्ताम्। ॐ सरितस्तुष्यन्ताम्। उॐ मनुष्यास्तुप्यन्ताम्। ॐ यक्षास्तृष्यन्ताम्। ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम् । ॐ पिशाचास्तुप्यन्ताम्। ॐ सुपर्णास्तृष्यन्ताम्। ॐ . भूतानि
प्रादेशमात्रमुद्धृत्य सलिलं प्राङ्मुखः ` सुरान्। ` उदङ् मनुष्यांस्तृप्येत्त पितृन् दक्षिणतस्तथा ॥ अग्रैस्त॒ तर्पयेददेवान् मनुष्यान् . कशमध्यतः। पितुस्तु कुशमूला्ररविधिः कौशी यथाक्रमम् ॥
* देवतार्ओंको एक-एक, मनुर्ष्योको दो-दो ओर पितरोको तीन-तीन अञ्जलि जल देना चाहिये । स्त्ियोमे ' माता, पितामही ओर प्रपितामही आदिको तीन-तीन, सौतेली मो ओर आचार्य-पत्नीको दो-दो तथा अन्य सब स्त्रर्योको एक-एक अञ्जलि जल देना चाहिये । व्यासजी कहते है-
एकैकमञ्जलिं देवा द्धौ द्धौ तु सनकादयः। अर्हन्ति पितरस्त्रस्तरीन् स्त्रिय एकैकमञ्जलिम्॥ सांख्यायन: -मातृमुख्यास्तु यास्तिसरस्तासां त्रीस्त्रीञ्जलाञ्जलीन्। सपल्याचार्यपत्ीनां द्वौ द्वौ ददयाज्जलाज्जली ॥
२६ संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवेश्वदेव-विधि
तुप्यन्ताम्। ॐ परवस्तृप्यन्ताम्। ॐ वनस्पतयस्तुप्यन्ताम् । ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम्। ॐ भूतग्रामञ्चतुर्विधस्तृप्यताम्। ऋषितर्पण
इसी प्रकार निम्नांकित मन्त्रवाक्योँसे मरीचि आदि ऋषिर्योको भी एक-एक अञ्जलि जल दे-
ॐ मरीचिस्तृप्यताम्। ॐ अत्रिस्तृप्यताम्। ॐ अद्धिरा- स्तृप्यताम्। ॐ पुलस्त्यस्तप्यताम्। ॐ पुलहस्तृप्यताम्। ॐ क्रतु- स्तृप्यताम्। ॐ वसिष्ठस्तुप्यताम्। ॐ प्रयेतास्तुप्यताम्। ॐ भृगुस्तृप्यताम्। ॐ नारदस्तृप्यताम् ।
दिव्यमनुष्यतर्पण
इसके बाद जनेऊको मालाकी भति गलेमें धारणकर [अर्थात् निवीती* हो] पूर्वोक्त कुर्शोको दाय हाथकौ कनिष्ठिकाके मूल-भागर्मे उत्तराग्र रखकर स्वयं उत्तराभिमुख हो निम्नांकित मन्त्र-वचनोंको दो-दो बार पढते हए दिव्यमनुरष्योके लिये प्रत्येकको दो-दो अञ्जलि यवसहित जल प्राजापत्यतीर्थं (कनिषठिकाके मूलभाग)-से अर्पण करे-
ॐ सनकस्तृप्यताम् ॥ २॥ ॐ सनन्दनस्तृप्यताम्॥ २॥
* देवतर्पण तथा अन्य कार्योमिं यज्ञोपवीत बार्ये कंधेपर रहता है, इसको उपवीत संज्ञा है। कंटठमें मालाकी भोति किया हुआ यज्ञोपवीत निवीत कहलाता है-' निवीतं कण्ठलम्बनम्।' (ओशनसस्मृति) दिव्यमनुर्ष्योके तर्पणे यज्ञोपवीतको निवीतभावसे ही रखना चाहिये-
निवीती हन्तकारेण मनुष्यांस्तर्पयेदथ । ( वाचस्पति) पितृकार्यमें यज्ञोपवीत दार्ये कंधेपर रहता है, इसको प्राचीनावीत या अपसव्य कहते है सव्यबाहुं समुद्धृत्य दक्षिणेन धृतं द्विजैः । प्राचीनावीतमित्युक्तं पित्रये कर्मणि धारयेत् ॥ (ओशनसस्मृति)
तर्पण-विधि २७
ॐ सनातनस्तुप्यताम्॥ २॥ ॐ कपिलस्तृप्यताम् ॥ २॥ ॐ आसुरिस्तृप्यताम् ॥ २॥ ॐ वोदुस्तृप्यताम्॥ २॥ ॐ पञ्चशिखस्तुप्यताम्॥ २॥ दिव्यपितुतर्पण तत्पश्चात् उन कुशको द्विगुण-भुग्न करके उनका मूल ओर अग्रभाग दक्षिणकी ओर कयि हुए ही उन्हँं अंगूठे ओर तर्जनीके बीचरमे रखे ओर स्वयं दक्षिणाभिमुख हो बार्ये घुटनेको पृथ्वीपर रखकर अपसव्य- भावसे (जनेऊको दार्ये कंधेपर रखकर) पूर्वोक्त पात्रस्थ जलम काला तिल* मिलाकर पितृतीर्थसे (अगूठा ओर तर्जनीके मध्यभागसे) दिव्य पितररोके लिये निम्नांकित मन्त्र- वाक्योको पढते हए तीन-तीन अञ्जलि जल दे। यथा- | ॐ कव्यवाडनलस्तुप्यताम् इदं सतिलं जलं ( गङ्गाजलं वा ) तस्मै स्वधा नमः॥ ३॥ ॐ सोमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं ( गङ्गाजलं वा ) तस्मै स्वधा नमः॥ ३॥ ॐ यमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं ८ गङ्गाजलं वा ) तस्मै स्वधा नमः ॥ ३॥ ॐ अर्यमा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं ( गङ्गाजलं वा ) तस्मै स्वधा नमः ॥ ३॥ ॐ अग्निष्वात्ताः पितरस्तुप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं ८ गङ्गाजलं वा )
* तिलसहित तर्पणका माहात्म्य वायुपुराणमें यो लिखा है- तिलदरभेस्तु संयुक्तं श्रद्धया यत् प्रदीयते। तत्सर्वममृतं भूत्वा पितृणामुपतिष्ठते ॥ +तिल ओर कुशाके साथ श्रद्धासे जो कुछ दिया जाता है, वह अमृतरूप होकर पितर्रोको प्राप्त होता है।' याज्ञवल्क्यने देवताओं, दिव्यमनुरष्योँ ओर पितरोकि लिये क्रमशः श्वेत, शबल ओर काले तिलका उपयोग बतलाया है- शुक्लैस्तु तर्पयेदेवान् मनुष्याञ्च्छबलैस्तिलैः। पितृस्तु तर्पयेत् कृष्णैस्तर्पणे सर्वदा द्विजैः ॥ अग्रिपुराणमें जीवत्पितृक (जिसका पिता जीवित हो उस)-के द्वारा तिलतर्पणका निषेध किया गया है- दर्श्राद्धं गयाश्राद्धं तिलैस्तर्पणमेव च। न जीवत्ितृको भूप कुर्यात् कृत्वाघमाप्नुयात्॥
२८ संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैश्वदेव-विधि
तेभ्यः स्वधा नमः॥ ३॥ ॐ सोमपाः पितरस्तृष्यन्ताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तेभ्यः स्वधा नमः॥३॥ ॐ बर्हिषदः पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं ८ गङ्गाजलं वा ) तेभ्यः स्वधा नमः॥ ३॥ यमतर्पण इसी प्रकार निम्नलिखित मन्त्र- वाक्योको पढते हुए चौदह यमेकि लिये भी पितृतीर्थसे ही तीन-तीन अञ्जलि तिलसहित जल दे- ॐ यमाय नमः॥३॥ ॐ धर्मराजाय नमः ॥ ३॥ ॐ मृत्यवे नमः ॥ ३॥ ॐ अन्तकाय नमः ॥ ३॥ ॐ वैवस्वताय नमः॥३॥ ॐ कालाय नमः॥ ३॥ ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः॥ ३॥ ॐ ओदुम्बराय नमः ॥ ३॥ ॐ दश्चाय नमः ॥ ३॥ ॐ नीलाय नमः ॥ ३॥ ॐ परमेष्ठिने नमः॥ ३॥ ॐ वृकोदराय नमः॥ ३॥ ॐ चित्राय नमः॥ ३॥ ॐ चित्रगुप्ताय नमः॥ २॥ मनुष्यपितृतर्पण इसके पश्चात् निम्नांकित मन्त्रसे पितरोका आवाहन करे- ॐ उशन्तस्त्वा नि धीमह्युशन्तः समिधीमहि। उशन्नुशत आ वह पितृन् हविषे अत्तवे॥ (यजु ० १९। ७०) हे अग्ने ! तुम्हारे यजनकी कामना करते हुए हम तुम्हे स्थापित करते है । यजनकी ही इच्छा रखते हुए तुम्हे प्रज्वलित करते है । हविष्यकी इच्छा रखते. हुए तुम भी तृप्तिकी कामनावाले हमारे पितररोको हविष्य ` भोजन करनेके लिये बुलाओ। आ यन्तु नः पितरः सोम्यासोऽगिष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः । अस्मिन् यत्ने स्वधया मदन्तोऽधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान् ॥ (यजु° १९। ५८)
तर्पण-विधि | २९
हमारे सोमपान करनेयोग्य अग्निष्वात्त ९ पितृगण देवता्ओंके साथ गमन करनेयोग्य मार्गसि यहं आवे ओर इस यक्ष्म स्वधासे तृप्त होकर हमे मानसिक उपदेश दं तथा वे हमारी रक्षा करे ।
तदनन्तर अपने पितुगर्णोका २ नाम-गोत्र आदि उच्चारण करते हुए प्रत्येकके लिये पूर्वोक्तं विधिसे ही तीन-तीन अञ्जलि तिलसहित जल दे। यथा-
अमुकगोत्र: अस्मत्पिता २( बाप) अमुकश्मां ४
१- जिनके शरीरका अग्निने आस्वादन किया है अर्थात् इस लोकमम मृत्युके पश्चात् जिनका शरीर दग्ध किया गया है, वे अग्निष्वात्त है । २- तर्पणे पितरोंका क्रम यो समञ्लना चाहिये- ताताम्बात्रितयं सपत्नजननी मातामहादित्रयं सस्त्निस््ीतनयादि तातजननीस्वभ्रातरः सस्त्ियः। ताताम्बात्मभगिन्यपत्यधवयुग् जायापिता सदगुरूः शिष्याप्ताः पितरो महालयविधौ तीर्थं तथा तर्पणे॥ पिता, पितामह, प्रपितामह। माता, पितामही, प्रपितामही। सौतेली माता। मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह। मातामही, प्रमातामही, वृद्धप्रमातामही । पत्नी, पुत्र (सपत्नीक एवं पुत्रसहित) पति-पुत्रसहित पुत्री । पत्नी-पुत्रादिसहित पितृव्य (चाचा) । मातुल (मामा) । स्वभ्राता तथा सौतेला भाई । पति-पुत्रादिसहित फू तथा मौसी। बहिन तथा सौतेली बहिन । पत्नी आदिसहित श्वशुर, सद्गुरु, शिष्य तथा आप्तपुरुष- ये सभी इसी क्रमसे महालयविधि (पितृपक्ष-श्राद्ध) तथा तीर्थश्राद्ध एवं तर्पणके पितर निश्चित किये गये है। २- पारस्कर गृह्यसूत्रके अनुसार क्रमशः गोत्र-सम्बन्ध-नामका उच्चारण करना चाहिये। ४- बौधायनः - शर्मान्तं ब्राह्यणस्योक्तं वर्मान्तं क्षत्रियस्य तु। गुप्तान्तं चैव वैश्यस्य दासान्तं शुद्रजन्मनः ॥ चतुर्णामपि वर्णानां गोत्रत्वे पितुगोत्रता। पितृगोत्रं कुमारीणामूढानां भर्तृगोत्रता ॥ वृद्धयाज्ञवल्क्यः -तुप्यतामिति वक्तव्यं नाम्ना तु प्रणवादिना। आवाह्य ॒पूर्ववन्मन्त्ररस्तीर्य च कुशांश्च तान्॥
३० संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवश्वदेव-विधि
वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं ( गङ्गाजलं वा ) तस्मै स्वधा नमः॥ ३॥ अमुक गोत्रः अस्मत्पितामहः ( दादा ) अमुकशमां रुद्ररूपस्तुप्यताम् इदं सतिलं जलं ( गङ्खाजलं वा ) तस्मै स्वधा नमः॥ ३॥ अमुक गोत्रः अस्मत्प्रपितामहः ( परदादा >) अमुकशर्मां आदित्यरूपस्तुष्यताम् इदं सतिलं जलं ८ गङ्खाजलं ९ वा ) तस्मै स्वधा नमः॥ ३॥ अमुकगोत्र अस्मन्माता अमुको देवी दार वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ ३॥ अपमुकगोत्रा अस्मत्पितामही ( दादी ) अमुकी देवी दा रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ ३॥ अमुकगोत्र अस्मत्प्रपितामही ८ परदादी ) अमुकी देवी .-दा आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ ३॥ अमुकगोत्रा अस्मत्सापतनमाता ( सौतेली माँ ) अमुक्री देवी दा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ २३॥
इसके बाद निम्नांकितः नौ मर्न्रोको पदृते हुए पितृतीर्थसे जल गिराता रहे-
ॐ उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः । असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु ॥ (यजु० १९। ४९)
इस लोकम स्थित, परलोके स्थित ओर मर्त्यलोकमें स्थित सोमभागी पितृगण क्रमसे ऊर्ध्वलोकोको प्राप्त हो । जो वायुरूपको प्राप्त हो चुके ठै, वे शत्रुहीन सत्यवेत्ता पितर आवाहन करनेपर [ यहं उपस्थित हों ] हमलोर्गोकी रक्षा करे ।
९- इसी प्रकार अन्यत्र भी 'गंगाजल' से तर्पण करते समय योजना कर
लेनी चाहिये। २- गोभिलसूत्रे- स्त्रीणां दान्तं नाम जेयम्।
तर्पण-विधि ३९
अदधिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः। तेषां वय \ सुमतौ य्चियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम॥ (यजु° १९। ५०) अंगिराके कुले, अथर्व मुनिके वंशर्मे तथा भृगुकुलमें उत्पननन हुए नवीन गतिवाले एवं सोमपान करनेयोग्य जो हमारे पितर इस समय पितृलोकको प्राप्त है, उन यज्ञम पूजनीय पितर्योकी सुन्दर बुद्धिम तथा उनके कल्याणकारी मनर्मे हम स्थित ररह [ अर्थात् उनकी मन-बुद्धिमे हमारे कल्याणक भावना बनी रहे] । आ यन्तु नः पितरः सोम्यासोऽग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः । अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधि ल्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान् ॥ (यजु° १९। ५८) इस मन्त्रका अर्थ पहले (पृष्ठ २९ मे) आ चुका. है। ऊर्जं वहन्तीरमृतं धृतं पयः कीलालं परिस्रुतम्। स्वधा स्थ तर्पयत मे पितृन् ॥ (यजु २। ३४) हे जल ! तुम स्वादिष्ट अननके सारभूत रस, रोग-मृत्युको दूर करनेवाले घी ओर सब प्रकारका कष्ट मिटानेवाले दुग्धका वहन करते हो तथा सब ओर प्रवाहित होते हो, अतएव तुम पितरोके लिये हविःस्वरूप हो, इसलिये मेरे पितर्रोको तृप्त करो। पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। अक्षन् पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतुपन्त पितरः पितरः शुन्धध्वम् ॥। | (यजु० १९। ३६) स्वधा (अन्न) -के प्रति गमन करनेवाले पितरोंको स्वधासंज्ञक^* अन्न प्राप्त हो, उन पितरोको हमारा नमस्कार रहै। स्वधाके प्रति जानेवाले पितामर्होको स्वधा प्राप्त हो, उन्हे हमारा नमस्कार है। स्वधाके प्रति गमन
+ “स्वधा वै पितृणामनम्" इति श्रुते ।
३२ संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैशुवदेव-विधि
करनेवाले प्रपितामर्होको स्वधा प्राप्त हो, उन्हे हमारा नमस्कार है। पितर पूर्णं आहार कर चुके, पितर आनन्दित हए, पितर तृप्त हुए। हे पितरो अन आपलोग [आचमन आदि करके] शुद्ध र्होे। ` ये चेह पितरो ये च नेह यांश्च विदा यों २ उ च न प्रविद्धा। त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञः सुकृतं जुषस्व ॥ (यजु० १९। ६७) जो पितर इस लोकम वर्तमान हँ ओर जो इस लोकम नहीं [कितु पितृलोकर्मे विद्यमान] है तथा जिन पितररोको हम जानते हैँ ओर जिनको [ स्मरण न होनेके कारण] नहीं जानते है, वे सभी पितर जितने है, उन सबको हे जातवेदा- अग्निदेव ! तुम जानते हो । [ पितररोके निमित्त दी जानेवाली ] स्वधाके द्वारा तुम इस श्रेष्ठ यज्ञका सेवन करो-इसे सफल बनाओ । मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ॥ (यजु० १२३। २७) यज्ञकी रक्षा करनेवाले यजमानके लिये वायु मधु (-पुष्परसमकरन्द) - को वर्षा करती है। बहनेवाली नदियों मधुके समान मधुर जलका स्रोत बहाती हैँ। समस्त ओषधिं हमारे लिये मधुर रससे युक्त हो । मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्यार्थिव ६ रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता॥ । (यजु° १२। २८) हमारे रात-दिन सभी मधुमय हो । पिताके समान पालन करनेवाला ` द्यूलोक हमारे लिये मधुमय-अमृतमय हो। माताके समान पोषण करनेवाली पृथिवीकी धूलिं हमारे लिये मधुमयी हो। मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमां २ अस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावो भवन्तु नः ॥ (यजु° १३। २९) ॐ मधु। मधु। मधु । तृप्यध्वम्। तुप्यध्वम्। तुप्यध्वम्। वनस्पति ओर सूर्य भी हमारे लिये मधुमान् (मधुर रससे युक्त) हो हमारी समस्त गौं माध्वी-मधुके समान दूध देनेवाली हो। `
तर्पण-विधि ३३
फिर नीचे लिखे मन्त्रका पाठमात्र करे-
ॐ नमो वः पितरो रसाय नमो वः पितरः शोषाय नमो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितरो घोराय नमो वः पितरो मन्यवे नमो वः पितरः पितरो नमो वो गृहयन्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो देष्येतद्धः पितरो वास आधत्त ॥ (यजु° २। २२)
हे पितृगण ! तुमसे सम्बन्ध रखनेवाली रसस्वरूप वसन्त-ऋतुको नमस्कार है, शोषण करनेवाले ग्रीष्म-ऋतुको नमस्कार है, जीवनस्वरूप वर्षा-ऋतुको नमस्कार है, स्वधारूप शरद-ऋतुको नमस्कार है, प्राणिर्योके लिये घोर प्रतीत होनेवाली हेमन्त-ऋतुको नमस्कार है, क्रोधस्वरूप शिशिर- ऋतुको नमस्कार है। [ अर्थात् तुमसे सम्बन्ध रखनेवाली सभी ऋतुं तुम्हारी कृपासे सर्वथा अनुकूल होकर सबको लाभ पहंचानेवाली हों ।]
हे षड़-ऋतुरूप* पितरो! तुम हमे [ साध्वी पत्नी ओर सत्पुत्र आदिसे युक्त].
उत्तम गृह प्रदान करो। हे पितृगण ! इन प्रस्तुत दातव्य वस्तु्ओंको हम तुम्हें अर्पण करते हँ, तुम्हारे लिये यह (सूत्ररूप) वस्त्र है, इसे धारण करो। द्वितीय गोत्रतर्पण
इसके बाद द्वितीय गोत्र मातामह आदिका तर्पण करे, यहो भी पहलेकी ही भोति निम्नलिखित वाक्योको तीन- तीन बार पढ़कर तिलसहित जलकी तीन-तीन अञ्जलियां पितृतीर्थसे दे। यथा-- .
अमुकगोत्रः अस्मन्मातामहः (नाना ) अमुकश्मां वसुरूप- स्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं ( गङ्जलं वा ) तस्मै स्तथा नमः॥ ३ ॥ अमुकगोत्रः अस्मत्प्रमातामहः ८ परनाना ) अमुकशर्मा रुद्ररूपस्तुष्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः ॥ ३ ॥ अमुकगोत्रः अस्मदवृद्ध- प्रमातामहः ( बृढे परनाना ) अमुकशर्मां आदित्यरूपस्तुष्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः ॥ ३ ॥ अमुकगोत्रा अस्मन्मातामही ( नानी ) अमुकी देवी दा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै
* ^षड् वा ऋतवः पितरः ' इति श्रुतेः
३ संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैश्वदेव-विधि
स्वधा नमः ॥ २॥ अमुकगोत्रा अस्मत्प्रमातामही ( परनानी ) अमुकी देवी दा रुद्ररूपा तुप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ ३॥ अमुकगोत्रा अस्मदवृद्धप्रमातामद्यी ( बृढी परनानी ) अमुकी देवी दा आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ ३॥ पल्यादितर्पण
अमुकगोत्रा अस्मत्यत्नी ८ भार्या ) अमुकी देवी दा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ १॥ अमुकगोत्र अस्मत्सुतः ( बेटा ) अमुकशर्मा वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः ॥ ३॥ अमुकगोत्रा अस्मत्कन्या ( बेटी ) अमुकी देवी दा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ ९॥ अमुक गोत्रः अस्मत्पितुव्यः ( पिताके भाई ) अमुकशमां वसुरूप- स्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः ॥ २॥ अमुक गोत्रः अस्मन्मातुलः ( मामा ) अमुकशमां वसुरूपस्तुष्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ ३॥ अमुकगोत्रः अस्पद्भ्राता ( अपना भाई ) अमुकशर्मा वसुरूपस्तुप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ ३॥ अमुकगोत्र: अस्मत्सापतनभ्राता ( सौतेला भाई ) अमुकशर्मां वसुरूपस्तुप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः ॥ ३॥ अमुकगोत्रा अस्मत्ितुृभगिनी ( बुआ ) अमुकौ देवी दा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ ९॥ अमुक गोत्रा अस्मन्मातुभगिनी ८ मौसी ) अमुकी देवी दा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ ९॥ अमुकगोत्रा अस्मदात्मभगिनी ( अपनी बहिन ) अमुकी देवी दा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ १॥ अमुकगोत्र अस्मत्सापलनभगिनी ( सौतेली बहिन ) अमुको देवी दा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः ॥ १॥ अमुकगोत्र अस्मच्छ्वशुरः ( श्वशुर ) अमुकशर्मा वसुरूपस्तुप्यताम् इदं सतिलं
तर्पण-विधि २५
नल तस्मै स्वधा नमः॥ २॥ अमुकगोत्रः अस्मदगुरुः अमुकशर्मा च्खुरूपस्तृष्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ ३॥ अमुकगोत्र +स्मदाचार्यपत्नी अमुक्री देवी दा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जल तस्यै स्वधा नमः ॥ २॥ अमुकगोत्रः अस्मच्छिष्यः अमुकशर्मा वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ ३॥ अमुकगोत्र अस्मत्सखा अमुकशर्मां वसुरूपस्तृष्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः ॥ ३ ॥ अमुकगोत्रः अस्मदाप्तपुरुषः अमुकश्मा वसुरूप- स्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मे स्वधा नमः॥ ३॥ इसके बाद सव्य होकर पूर्वाभिमुख हो नीचै लिखे श्लोकोंको पढ़ते हए जल गिरावे- देवासुरास्तथा यक्षा नागा गन्धर्वराक्षसाः । पिशाचा गुह्यकाः सिद्धाः कूष्माण्डास्तरवः खगाः ॥ जलेचरा भूनिलया वाय्वाधाराश्च जन्तवः । प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु महत्तेनाम्बुनाखिलाः ॥ देवता, असुर, यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध, कूष्मांड, वृक्षवर्ग, पक्षी, जलचर तथा थलचर जीव ओर वायुके आधारपर रहनेवाले जन्तु-ये सभी मेरे दिये हए जलसे शीघ्र तृप्त हो । इसके बाद अपसव्य होकर दक्षिणाभिमुख* हो नीचे लिखे हए
श्लोकोंको पटढकर पितृतीर्थसे जल गिरावे- नरकेषु समस्तेषु यातनासु च ये स्थिताः तेषामाप्यायनायैतदीयते सलिलं मया ॥
येऽबान्धवा बान्धवाश्च येऽन्यजन्मनि बान्धवाः । ते तुप्तिमिखिला यान्तु यश्चास्पत्तोऽभिवाञ्छति॥ ये मे कुले लुप्तपिण्डाः पुत्रदारविवजिताः। तेषां हि दत्तमक्षय्यमिदमस्तु तिलोदकम् ॥
* पारस्कर गृह्यसूत्र, तर्पण-प्रयोगमें अपसव्य होकर तर्पणका विधान है।
वज्र
ज ~ क ~ | |
३६ संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैशुवदेव-विधि
। आब्रह्यस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः। 1:
तृप्यन्तु पितरः स्वे मातुमातामहादयः॥ अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम्। आब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम् ॥
(८ जो. समस्त नरको तथा वर्हांकी यातनाओंमे पड़े-पड़े दुःख भोग ४ रहे है, उनको -पुष्ट तथा शान्त करनेकी इच्छासे मेँ यह जल देता हूं। जो | मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्म्मे बान्धव रहे हो अथवा किसी दूसरे जन्मे मेरे बान्धव रहे हो, वे सन तथा इनके अतिरिक्त भी जो मुञ्ञसे जल पानेकी इच्छा रखते हो, वे भी मेरे दिये हुए जलसे तृप्त हो । जो मेरे कुलमें पिंडदान ओर स्त्री-पुत्रसे रहित हो, उनके लिये मेरे दवारा दिया गया यह तिलमिश्ित जल अक्षय हो। बरह्माजीसे लेकर कीरटोतक जितने जीव रहै वे तथा देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य ओर माता, नाना आदि पितृगण-ये सभी तृप्त हो, मेरे कुलकी बीती हुई करोड़ पीदिर्योमे उत्पन हुए जो-जो पितर ब्रह्मलोक- पर्यन्त सात द्वीपोकि भीतर कीं भी निवास करते हो, उनकी तृप्तिके लिये मेरा दिया हुआ यह तिलमिश्रित जल उन्हँ पराप्त हो । वस्त्र-निष्पीडन * तत्पश्चात् वस्त्रको चार आवृत्ति लपेटकर जले इुनावे ओर बाहर * वस्त्र-निष्पीडनके विषयमे स्मृतिर्योकि वचन- योगियान्ञवल्क्यः-- वस्त्रनिष्पीडितं तोयं स्नातस्योच्छिषटभागिनः। भागधेयं श्रुतिः प्राह तस्मानिष्पीडयेत् स्थले ॥ वस्त्र निचोडनेसे जो जल निकलता है, वह स्नान करनेवाले पुरुषके उच्छिष्ट भागी जीर्वोका भाग है, एेसा श्रुति कहती है। अतः उसे स्थलमें निचोडना चाहिये। वृद्धयोगी--यावदेतानृर्षीश्चैव पितृंश्चापि न॒ तर्पयेत्। | तावन पीडयेद्रस्त्रं येन स्नातो भवेन्नरः॥ जबतक इन ऋषिर्योँ ओर पितरौका तर्पण न कर ले, तबतक मनुष्य उस वस्त्रको न निचोडे, जिसे पहनकर उसने स्नान किया हो। | स्मृत्यन्तरे वस्त्रं चतुर्गुणीकृत्य पीडयेच्च जलाद् बहिः। | वामकोष्टे विनिक्षिप्य द्विराचम्य शुचिर्भवेत्॥
तर्पण-विधि २७
ले आकर निम्नांकित मन््रको पढते हुए अपसव्यभावसे अपने नार्य भागे भूमिपर उस वस्त्रको निचोडे। (पवित्रकको तर्पण किये हए जलमं छोड़ दे। यदि घरमे किसी मृत पुरुषका वार्षिक श्राद्ध आदि कर्म हो तो वस्त्र-निष्पीडन नहीं करना चाहिये) वस्त्र-निष्पीडनका मन्त्र यह है- ये चास्माकं कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः। ` गृहन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम् ॥ भीष्म-तर्पण इसके बाद दक्षिणाभिमुख हो पितृतर्पणके समान हाथमे कुश धारण किये हए ही बालब्रह्यचारी भक्तप्रवर भीष्मके लिये पितृतीर्थसे तिलमिश्चित जलके द्वारा तर्पण करे । उनके लिये तर्पणका मन्त्र निम्नांकितः श्लोकः है- वैयाघ्पदगोत्राय साङ्कतिप्रवराय च। गङ्कापुत्राय भीष्माय प्रदास्येऽहं तिलोदकम् ४ अपुत्राय ददाम्येतत्सलिलं भीष्पवर्मणे। अर््यदान तदनन्तर यज्ञोपवीत बा्ये कंधेपर करके पूर्वाभिमुख होकर शुद्ध जलसे आचमन करके प्राणायाम करे। फिर एक पात्र्मे शुद्ध जल भरकर उसके मध्य-भागर्गे अनामिकासे षड्दल-कमल * बनावे ओर उसमे श्वेत चन्दन, `
वस्त्रको चार आवृत्ति लपेटकर उसे जलसं बाहर ले जाकर निचोडे। फिर उसे बायीं कलाईपर रखकर दो बार आचमन करके पवित्र हो जाय। | * षड्दल-कमल
। "रि
३८ संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैश्वदेव-विधि
अक्षत, पुष्प तथा तुलसीदल छोड दे। फिर दूसरे पात्र्मं चन्दनसे षड्दल-
कमल बनाकर उसमे पूर्वादि दिशाके क्रमसे ब्रह्मादि देवता्ओंका आवाहन- पूजन करे तथा पहले पात्रके जलसे उन पूजित देवता्ओंके लिये अर्घ्य अर्पण करे । अर्घ्यदानके मन्त्र निम्नांकित है-
ॐ ब्रह्म" जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्धि सीमतः सुरुचो वेन आवः । स बुध्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः॥ (यजु° १३। ३) ॐ ब्रहमाणे नमः । ब्रह्माणं पूजयामि ॥
सर्वप्रथम पूर्वं दिशासे प्रकट होनेवाले आदित्यरूप ब्रह्मने भूगोलके मध्यभागसे आरम्भ करके इन समस्त सुन्दर कान्तिवाले लोर्कोको अपने प्रकाशसे व्यक्त किया है तथा वह अत्यन्त कमनीय आदित्य इस जगत्कौ निवासस्थानभूत अवकाशयुक्त दिशा्ओंको, विद्यमान-मूर्तपदार्थके स्थानोको ओर अमूर्तं वायु आदिके उत्पत्तस्थानोको भी प्रकाशित करता है ।
ॐ इदं चिष्णुविं चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्। समूढमस्य पा ६ सुरे स्वाहा ॥ (यजु° ५।१५) ॐ विष्णवे नमः । विष्णुं पूजयामि ॥
सर्वव्यापी त्रिविक्रम (वामन) अवतारधारी भगवान् विष्णुने इस चराचर जगत्को विभक्त करके [ चरर्णोसे] आक्रान्त किया है। उन्हनि पृथ्वी, आकाश ओर द्युलोक-इन तीनो स्थार्नमिं अपना चरण स्थापित किया है [अथवा उक्त तीनों स्थानो वे क्रमशः अग्नि, वायु तथा सूर्यरूपसे स्थित है], इन विष्णुभगवानूके चरणमे समस्त विश्व अन्तर्भूत है । "हम इनके नितिंत्त स्वाहा (हविष्यदान) करते है
ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव उतो त इषवे नमः। बाहुभ्यामुत ते नमः। (यजु० १६। १) ॐ रुद्राय नमः। रुद्रं पूजयामि ॥ ` हेरद्र ! आपके क्रोध ओर बाणको नमस्कार है तथा आपकी दोनों भुजाओंको नमस्कार है।
* अत्र ब्रह्मशब्दोपादानाल्लिङ्खाद् ब्रह्मणः स्तवनम्।
तर्पण-विधि ३९
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ (यजु° ३६। ३२) ॐ सवित्रे नमः। सवितारं पूजयामि ॥
हम स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्णं विश्वको उत्पन्न करनेवाले उन निरतिशय प्रकाशमय सूर्यस्वरूप परमेश्वरके भजनेयोग्य तेजका ध्यान करते हैँ, जो कि हमारी बुद्धिर्योको सत्कर्मोकी ओर प्रेरित करते रहते है ।
ॐ मित्रस्य चर्षणीधुतोऽवो देवस्य सानसि। द्युम्नं चित्रश्रव- स्तमम्॥ (यजु° ११। ६२) ॐ मित्राय नमः। मित्रं पूजयामि ॥
मनुर्ष्योका पोषण करनेवाले दीप्तिमान् मित्रदेवताका यह रक्षण- कार्य सनातन, यशरूपसे प्रसिद्ध, विचित्र तथा श्रवण करनेके योग्य हेै।
ॐ इमं मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडय । त्वामवस्युरा चके ॥ (यजु° २९१। १) ॐ वरुणाय नमः। वरुणं पूजयामि ॥
हे संसार-सागरके अधिपति वरुणदेव ! अपनी रक्षके लिये मँ आपको बुलाना चाहता हू आप मेरे इस आवाहनको सुनिये ओर [यहां शीघ्र पधारकर ] आज हरमे सब प्रकारसे सुखी कीजिये। सूर्योपस्थान |
इसके बाद निम्नांकित मन्त्र पढ़कर सूर्योपस्थान (सूर्यको प्रणाम एवं प्रार्थना) करे-
ॐ अदृश्रमस्य केतवो वि रश्मयो जनों २ अनु। भ्राजन्तो अग्रयो यथा। उपयामगृहीतोऽसि सूर्याय त्वा भराजायैष ते योनिः ` सूर्याय त्वा भ्राजाय। सूर्य भ्राजिष्ठ भाजिष्टस्त्वं देवेष्वसि भ्राजिष्ठोऽहं मनुष्येषु भूयासम्॥ ह ६ सः शुचिषद्वसुरन्तरिश्चसद्धोता वेदिषदतिथि्दुरोणसत्। नृषद्वरसदूतसद्वयोमसदल्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं वृहत् ॥ (यजु ८।४०, १०। २४)
प्रज्ाकौ हेतुभूत एवं सम्पूर्णं पदार्थोका ज्ञान करानेवाली इन सूर्यदेवकी किरणे समस्त प्राणिर्योके भीतर विशेषरूपसे अनुगत (व्याप्त) देखी गयी है
४० संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवश्वदेव-विधि
जैसे देदीप्यमान अग्नि सर्वत्र व्याप्त देखी जाती है। हे सोम! तुम उपयामपात्रद्रारा गृहीत हो, मँ दीप्तिमान् सूर्यदेवके निमित्त तुम्हें ग्रहण करता ह| यह तुम्हारा स्थान है; मेँ दीप्तिशाली भगवान् सूर्यदेवके लिये तुम्हे इस स्थानपर रखता हू। हे अत्यन्त देदीप्यमान सूर्यदेव ! जिस प्रकार तुम सब देवताओं अत्यन्त प्रकाशमान हो उसी प्रकार तुम्हारे प्रकाशसे मै भी मनुर्ष्योमिं अत्यन्त प्रकाशमान होऊं। हे सूर्यभगवान् ! आप अहंकारका नाश करनेवाले (हंस), प्रकाशमे गमन करनेवाले (शुचिषत्), अपनेमे सनको निवासित करनेवाले (वसु), वायुरूपसे अन्तरिक्षम गमन करनेवाले (अन्तरिक्षसत्), देर्वोंको बुलानेवाले (होता), अग्निरूपसे वेदीपर स्थित होनेवाले (वेदिषत्), सबके पूजनीय (अतिथि), यन्ञशालामें आहवनीयादि अग्निरूपसे प्राप्त होनेवाले (दुरोणसत्), प्राणरूपसे मनुष्यों विचरनेवाले (नृषत्), श्रेष्ट स्थानम गमन करनेवाले (वरसत्), यजे प्राप्त होनेवाले (ऋतसत्) ओर आकाशम विचरनेवाले (व्योमसत्) है तथा आप जलमे उत्पन होनेवाले (अन्ना), चार प्रकारके प्राणिर्योके रूपमे पृथ्वीपर उत्पन होनेवाले (गोजा), सत्यसे उत्पन होनेवाले (ऋतजा), पर्वते उत्पनन होनेवाले (अद्रिजा) एवं सत्यस्वरूप ओर महान् है । मँ आपको प्रणाम करता हूं। |
इसके पश्चात् दिग्देवताओंको पूर्वादि क्रमसे नमस्कार करे- "ॐ इन्द्राय नपः' प्राच्यै ॥ ' ॐ अग्नये नमः ' आग्नेय्यै ॥ "ॐ यमाय नमः ' दक्षिणायै ॥ ' ॐ निऋतये नमः ' नैर््त्यै ॥ ॐ वरूणाय नमः ' पश्चिमायै ॥ ˆ ॐ वायवे नमः' वायव्य ॥ ॐ सोमाय नमः' उदीच्यै ॥ " ॐ ईशानाय नमः ' एेशान्यै ॥ ॐ ब्रह्मणे नमः' ऊ्ध्वयि ॥ * ॐ अनन्ताय नमः ' अधरायै ॥
इसके बाद जलम नमस्कार करे-
ॐ ब्रह्मणे नमः। ॐ अग्नये नमः। ॐ पर्थिव्यै नमः। ॐ ओषधिभ्यो नमः। ॐ वाचे नमः। ॐ वाचस्पतये नमः।
तर्पण-विधि श
ॐ महदभ्यो नमः। ॐ विष्णवे नपः। ॐ अदभ्यो नपः। ॐ अपाम्पतये नमः। ॐ वरुणाय नमः। मुखमार्जन
फिर नीचे लिखा मन्त्र पदढ्कर शुद्ध जलसे मुंह धो डले- ॥
ॐ सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा स < शिवेन। ` त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोऽनुमार्ष्टु तन्वो यद्विलिष्टम्। (यजु २।२४)
हम ब्रह्यतेजसे, क्षीर आदि रससे, कर्म करनेमे समर्थ सुदृढ अंगोसे ओर शान्त मनसे संयुत हो । सम्यक् प्रकारसे दान करनेवाले त्वष्टा देवता हम धन दँ ओर हमारे शरीरमे जो शक्ति आदिकी न्यूनता आ गयी है, उसका मार्जन करं [ अर्थात् हमारे धन ओर शरीरको पुष्टि करे] ।
विसर्जन
निम्नांकित मन्त्र पढ्कर देवतार्ओंका विसर्जन करे-
ॐ देवा गातुविदो गातुं वित्वा गातुभित।
मनसस्पत इमं देव यञ्च स्वाहा वाते धाः॥ (यजु० ८। २१) हे यज्ञवेत्ता देवताओं ! आपलोग हमारे इस तर्पणरूपी यञ्चको समाप्त जानकर अपने गन्तव्यमार्गको पधारर। हे चित्तके प्रवर्तक परमेश्वर! मँ इस यञ्चको आपके हाथमे अर्पण करता हूं। आप इसे वायुदेवता स्थापित करे ।
समर्पण
निम्नाकित वाक्य पदुकर यह तर्पण-कर्म भगवान्को समर्पित करे- अनेन यथाशक्तिकृतेन देवर्षिमनुष्यपिततर्णाख्येन कर्मणा भगवान् मम समस्तपितुस्वरूपी जनार्दनवासुदेवः प्रीयतां न मम। ॐ विष्णवे नमः । ॐ विष्णवे नमः । ॐ विष्णवे नमः। ॥ ॐ तत्सदब्रह्यार्पणमस्तु ॥ ॥ इति ॥
> १1 1
बलिवैश्वदेव-विधि बलिवैश्वदेव-विधि इस प्रकार है- पहले आचमन ओर प्राणायाम करके दार्ये हाथकी अनामिका अंगुली “पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ" इस मन्त्रसे कुशकी पवित्री धारण करे। तत्पश्चात् निम्नांकित सकल्प पदे। (यह संकल्प मानसिक भी किया जा सकता है।) हरिः ॐ तत्सत् *.....अद्य शुभपुण्यतिथौ मम गृहे पञ्च- सूनाजनितसकलदोषपरिहारपूर्वकं नित्यकर्मानुष्ठानसिद्िद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं बलिवैश्वदेवाख्यं कर्म करिष्ये । इसके बाद लौकिक अग्नि प्रज्वलित करके अग्निदिवका निम्नांकित मन्त्र पढते हुए ध्यान करे- ॐ चत्वारि श्यङ्खा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य। त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्यां आ विवेश ॥ (ऋ० अ० २३ अ० ८ व० १०) इस अग्निदिवके चार सींग, तीन पैर, दो सिर ओर सात हाथ हैं। कामनार्ओंकी वर्षा करनेवाला यह महान् देव तीन स्थार्नोमे बधा हुआ शब्द करता है ओर प्राणिर्योकि भीतर जठरानलरूपसे प्रविष्ट है। फिर नीचे लिखे मन्त्रको पदुकर अग्निदिवको मानसिक आसन दे- ॐ एषो ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भ अन्तः। स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ् जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥ (यजु° ३२। ४) यह अग्निस्वरूप परमात्मदेव ही सम्पूर्णं दिशा-विदिशाओंमें व्याप्त है यही हिरण्यगर्भरूपसे सबसे प्रथम उत्पनन (प्रकट) हुआ था, माताके गर्भमें
शून्य स्थानपर संध्या ओर तर्पणके अनुसार देश, काल, नाम आदिकी योजना कर् लेनी चाहिये।
बलिवैश्वदेव-विधि ` ३
भी यही रहता है ओर यही उत्पन होनेवाला है, हे मनुष्यो । यही सर्वव्यापक ओर सब ओर मुखोंवाला हेै।
तत्पश्चात् अग्निदिवको नमस्कार करके एक पात्र्मे बिना लवण (लोन)-का सुपक्व अनन रख ले ओर यज्ञोपवीतको सव्यभाव्मे रखे हुए ही दार्ये घुटनेको पृथ्वीपर टेककर अननकी पंच आहुतियाँ नीचे लिखे पाँच मरन्त्रोको क्रमशः पदते हुए बारी-बारीसे अग्निम छोडे। (अग्निके अभावे एक पात्रे जल रखकर उसीर्मे आहुतियाँ छोड सकते हैँ ।)
(९) देवयज्ञ
९ ॐ ब्रह्मणे स्वाहा, इदं ब्रह्मणे न मम *। अग्नि। २ ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये न मम। ३ ॐ गृह्याभ्यः स्वाहा, इदं गृह्याभ्यो न मम। २ | ४ ॐ कश्यपाय स्वाहा, इदं कश्यपाय न पममे।
५ ॐ अनुमतये स्वाहा, इदमनुमतये न मम।
पुनः अग्निके पास ही पानीसे एक चौकोना चक्र बनाकर उसका द्वार पूर्वकी ओर रखे ओर उसीर्मे बतलाये जनेवाले स्थार्नोपर क्रमशः बीस ग्रास अन्न देना चाहिये । जिज्ञासु्ओंकी सुविधाके लिये नकशा ओर ग्रास अर्पण करनेके मन्त्र अगले पृष्ठ ४४ मेँ दिये जाते ह। नकशेर्मे केवल अंक रखा गया है, उसमे जहां एक है वहो प्रथम ग्रास ओर दोकी जगह दूसरा ग्रास देना चाहिये । इसी प्रकार तीनसे चलकर बीसतक क्रमशः निर्दिष्ट स्थानपर ग्रास देना उचित है। नकशेके नीचे क्रमशः बीस मन्त्र दिये जाते है, एक-एक मन्त्र पढ़कर एक-एक ग्रास अर्पण करना चाहिये।
* प्रथम मन्त्रका अर्थ इस प्रकार है--' ब्रह्माजीके लिये इस अनका हवन किया जाता है, यह ब्रह्माजीके लिये ही प्राप्त हो, इसपर मेरा अधिकार नहीं है ।" इसी प्रकार अन्य मर्त्रोका अर्थं समञ्जना चाहिये। २, ३, ४ ओर ५ में क्रमशः प्रजापति, गृह्या, कश्यप तथा अनुमतिके लिये हवन किया गया है।
४ संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैश्वदेव-विधि चति पूर्व
पश्चिम (२) भूतयज्ञ * ९ ॐ धात्रे नमः, इदं धात्रे न मम। २ ॐ विधात्रे नमः, इदं विधात्रे न मम। ३ ॐ वायवे नमः, इदं वायवे न मम। ४ ॐ वायवे नमः, इदं वायवे न मम। ५ ॐ वायवे नमः, इदं वायवे न मम। ६ ॐ वायवे नमः, इदं वायवे न मम। ७ ॐ प्राच्यै नमः, इदं प्राच्यै न मम। ८ ॐ अवाच्यै नमः, इदमवाच्यै न मम। ९ ॐ प्रतीच्यै नमः, इदं प्रतीच्यै न मम।
१० ॐ उदीच्यै नमः, इदमुदीच्यै न मम। १९ ॐ ब्रह्मणे नमः, इदं ब्रह्मणे न मम। ९२ ॐ अन्तरिश्चाय नमः, इदमन्तरिक्चाय न मम। १३ ॐ सूर्याय नमः, इदं सूर्याय न मम।
* यज्ञोपवीतको सव्य करके पके हुए अननके १७ ग्रास अंकित मंडलमें यथायोग्य स्थानपर नीचे लिखे हुए मर्न्रोद्राा क्रमशः छोड दे।
न
बलिवैर्वदेव-विधि ४५
९४ ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः, इदं विश्वेभ्यो देवेभ्यो न मम।
९५ ॐ विश्वेभ्यो भूतेभ्यो नमः, इदं विश्वेभ्यो भूतेभ्यो न मम।
९६ ॐ उषसे नमः, इदमुषसे न मम।
९७ ॐ भूतानां पतये नमः, इदं भूतानां पतये न मम।
(३ ) पितृयज्ञ ९ १८ ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः, इदं पितृभ्यः स्वधा न मम। निर्णेजनम् २ ९९ ॐ यक्षमेतत्ते निर्णेजनं नमः, इदं यक््पणे न मम। ( ४ ) मनुष्ययज्ञ ३ २० ॐ हन्त ते सनकादिमनुष्येभ्यो नमः, इदं हन्त ते सनकादिमनुष्येभ्यो न मम। (५ ) ब्रह्मयज्ञ पूर्वाभिमुख सव्य होकर गायत्री मन्त्रका जप (कम-से-कम ३ बार) करे। पञ्चनलिके मन्त्र (१) गोबलि
निम्नांकित मन्त्र पदते हुए सव्यभावसे ही गौअकि लिये बलि अर्पण करे ॐ सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पुण्यराशयः।
प्रतिगृहन्तु मे ग्रासं गावस्त्ैलोक्यमातरः॥
इदं गोभ्यो न मम।
१- यज्ञोपवीतको अपसव्य करके वारये घुटनेको पृथ्वीपर रखकर दक्षिणकी ओर
मुख करके हो सके तो साथमे तिल लेकर, पक्व अन अंकित मंडलमे निर्दिष्ट स्थानपर मन्त्र पदठकर रख दे।
२- यज्ञोपवीतको सव्य करके अन्नके पात्रको धोकर वह जल अंकित मंडलमें १९ वें अंककी जगह मन्त्र पदृकर छोड दे।
३- यज्ञोपवीतको मालाकी भोति कंठ्मे करके उत्तराभिमुख हो पक्व अन्न अंकित मंडले २० वं अंकक जगह मन्त्रद्वारा छोड़ दे।
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४६ संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैशुबदेव-विधि
(२) कुक्कुरबलि फिर यज्ञोपवीतको कण्ठरमे मालाको भोति करके कुत्तोकि लिये ग्रास दे। मन्त्र यह है- ॐ द्धौ शवानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोद्धव । ताभ्यामननं प्रदास्यापि स्यातामेतावर्हिंसक्ौ॥ इदं श्वभ्यां न मम। (३ ) काकबलि पुनः यज्ञोपवीतको अपसव्य करके नीचे लिखे मन्त्रको पढते हए कौओकि लिये भूमिपर ग्रास दे- ॐ पेच्ध्रवारुणवायव्या याम्या वै नैऋतास्तथा। वायसाः प्रतिगृह्णन्तु भूमौ पिण्डं मयोज्द्ितम्॥ इदं वायसेभ्यो न मम। (४ ) देवादिबलि फिर सव्यभावसे निम्नांकित मन्त्र पढकर देवता आदिके लिये अनन अर्पण करे- | ॐ देवा मनुष्याः पशवो वयांसि सिद्धाः सयक्षोरगदेत्यसङ्ः। प्रेताः पिशाचास्तरवः समस्ता ये चानमिच्छन्ति मया प्रदत्तम्॥ इदमननं देवादिभ्यो न मम। (५) पिपीलिकादिबलि इसी प्रकार निम्नांकित मन््रसे चींटी आदिके लिये अन दे- ॐ पिपीलिकाः कीटपतङकाद्या बुभुक्षिताः कर्मनिलन्धवद्दधाः । तेषां हि तृष्त्यर्थमिदं मयान्नं तेभ्यो विसुष्टं सुखिनो भवन्तु ॥ इदमन्नं पिपीलिकादिभ्यो न मम।
1/7, / |
सं्छिप्त भोजन प्रयोग ^
बलिवैश्वदेवके बाद अतिथि-पूजनादिसे निवृत्त होकर अपने कुटुम्बिर्योके साथ भोजन करे । पहले * ॐ नमो भगवते वासुदेवाय इस मन्त्रका उच्चारण करके अपने आगे जलसे चार अंगुलका चौकोना मंडप बनावे ओर उसीपर भोजनपात्र रखकर उसमे घृतसहित व्यञ्जन रखावे तथा अपने दाहिने तरफ जलपात्र रखे, फिर भगवदबुद्धिसे अननको प्रणाम करके-
* भोजनके विषये ऋषिर्योदवारा बतायी हुई कुछ बाते नीचे दी जा रही है- दोनों पैर, दोनों हाथ ओर मुंह धोकर पूर्वकी ओर मुख करके मौनभावसे भोजन करे । जिसके माता-पिता जीवित हों वह दक्षिणको ओर मुख करके भोजन न करे। भोजन करते समय बार्ये हाथसे अन्नका स्पर्श न करे ओर चरण, मस्तक तथा अंडकोषको भीन छुए। केवल प्राणादिके लिये पाँच ग्रास अर्पण करते समयतक वाये हाथसे पात्रको पकड़ रहे, उसके बाद छोड दे। भोजनके समय हाथ घुरर्नोके बाहर न करे। भोजन - काल्मे वार्य हाथसे जलपात्र उठाकर दाहिने हाथकी कलार्ईपर रखकर यदि पानी. पिये तो वह पात्र भोजन समाप्त होनेतक जूढा नहीं माना जाता-एेसा मनुका कथन है। यदि भोजन करता हुआ द्विज किसी दूसरे भोजन करते हुए द्विजको चूदेतो दो्नोको ही भोजन छोड़ देना चाहिये । रत्रिको भोजन करते समय यदि दीप बुञ्च जाय तो भोजन रोक्र दे ओर अनका दाये हाथसे स्पर्शं करते हुए मन-ही-मन गायत्रीका स्मरण करे। पुनः दीप जलानेके बाद ही भोजन आरम्भ करे। अधिक मात्रामे भोजन करनेसे आयु तथा आरोग्यका नाश होता हे। उदरका आधा भाग अन्नसे भरे चौथाईं भाग जलसे भरे ओर एक चौथाई भाग वायुके आने-जानेके लिये खाली रखे। भोजनके बाद थोडी देर्तक बैठे । फिर १०० कदम चलकर बायीं करवरसे कुछ देरतक लेटे रहे तो
अनन ठीक पचता दै। भोजनके अन्तमें भगवानूको अर्पण किया हुआ तुलसीदल भक्षण करना चाहिये ।
४८ संध्योपासनविधि ओर तर्पण एवं बलिवैश्वदेव-विधि
ॐ ब्रहयार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रहौीव तेन गन्तव्यं ब्रहमकर्मसमाधिना॥ त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये। गृहाण सुमुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर॥ -इन मन्त्रोका उच्चारण करते हए-अन्नमे तुलसीदल छोडकर जलसहित. अनन भगवान् नारायणको अर्पण करे, फिर दोनों हार्थोसे अननको ऊपरसे आवृत कर इस मन्त्रका पाठ करे- ॐ नाभ्या आसीदन्तरिश्च ‡ शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत । पदभ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकांँरं अकल्पयन् ॥ (यजु ३१। १३) *परमेश्वरकी नाभिसे अन्तरिश्च, सिरसे द्युलोक, पैरोसे भूमि ओर कार्नसि दिशाओंकी उत्पत्ति हुई । इस प्रकार परमात्माने समस्त लोर्कोको रचना को।* ` ` तदनन्तर “ॐ अमृतोपस्तरणमसि" इस मन्रसे आचमन करके आगे लिखे हुए पांच मन्त्रसि क्रमशः एक-एकको पदकर एक-एक ग्रास अन (जो बेर या ओंवलेके फलके बराबर हो) मुँहमे डाले- ९-ॐ प्राणाय स्वाहा। २-ॐ अपानाय स्वाहा। ३-ॐॐ व्यानाय स्वाहा । ४-ॐ समानाय स्वाहया । ५-ॐ उदानाय स्वाहा। -इसके बाद पुनः आचमन करके मौन होकर ` यथाविधि भोजन करे। भोजनके अन्तर्मे “ॐ अपुतापिधानमसि" इस मन्त्रसे आचमन करना चाहिये।
गोरखपुर-२७३००५ गीताप्रेस --पो० गीताप्रेस ८, ( ०५५१ ) २३३४७२१; फक्स २३३६९९७ ५605116 : ४५५/५५.11807655.010 / €-7118॥: ०००।९58165 @ 411801655.014
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मरीन लाईन्स स्टेशनके पास (८) ( ०२२ ) २२०३०७९७ कानपुर-२०८००९ ` २४/५५, विरहाना रोड ८ ( ०५९१२ ) २३५२३५९; फक्स २३५२३५१
पटना-८००००४ जशोकराजपथ, महिला अस्पतालके सामने ८) ( ०६१९२ ) २३००३२५ रांची - ८३२४००१ काटं सराय रोड, अपर वाजार, विटला गरीके प्रथम तलपर £ ( ०६५९१) २२९०६८५
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8-118॥:4118018\//8) @ 011801655.010 ` २४२३२७९२ कोयम्बटूर- ६४१०९१८ गीताप्रेस मंशन, ८/१ एम, रसकोर्म ( तमिलनाडु) ८) ( ०४२२ ) ३२०२५२१
बंगलोर -^६००२७ १५, फोर्थं इ-क्रास, क० एस० गार्डन, राजधानी स्टील स्युवके सामन, लालवाग रोड
स्टेान-स्टाल -- | दिल्ली (प्लेरफार्म नं० १२); नयी दिल्ली (नं० ८-९); हजरत
निजामुदहीन [दिल्ली] (नं० ४-५); कोटा [राजस्थान] (नं० १); बीकानेर (नं० १); गोरखपुर (नं० १); कानपुर (नं० १); लखनऊ [एन० ई० रेलवे]; वाराणसी (नं० ४-५); मुगलसराय ( नं० ३-४) ; हरिद्वार (नं° १); पटना (मुख्य प्रवेशद्रार ) ; राँची (नं° १); धनवाद (नं २-३); मुजफ्फरपुर ( न° १); समस्तीपुर (नं० २); हावड़ा (नं° ५ तथा १८ दोनोँपर ) ; सियालदा मेन ( नं° ८); आसनसोल (नं० ५); कटक (नं० १); भुवनेष्वर (नं० १); राऊरकेला (पुस्तक-टराली); राजगांगपुर (पुस्तक - टराली ); ओरेगाबाद [ महाराष्ट्र] (नं० १); सिकन्दराबाद [आं० प्र] (नं० १); गुवाहाटी (नं० १); रड़गपुर ( नं० १-२); रायपुर [ छत्तीसगढ़ ] (न° १९) एवं अन्तरयाज्यीय बस-अट्वा, दिल्ली ।
टकर पुस्तक दुकानें
८, ( ०८० ) २२९५५९९०
1581 81-293-0
चुरू- ३३१००९१ ऋषिकुल ब्रह्मचर्याश्रम, पुरानी सडक | || ८) ( ०१५६२ ) २५२९६७४
ऋषिकेष- २४९१९९२ मनिकी रेती तिरुपति- ५१९७५०४ णोप नं० ५६, टी० टी०° डी० पिनी शाोँपिग क्रोप्प्लेक्स, तिरुमलाई हिल्स
00€ 210 |